चोरा-नुका कहाँ,दिने देखार केलक ओ (मैथिलि ग़ज़ल)
चोरा-नुका कहाँ,दिने देखार केलक ओ॥
✍विधानन्द बेदर्दी
एक दुइ बेर नइ यौ, बारम्बार केलक ओ
हमर भावनाक साथ खेलवार केलक ओ॥
हँसैत खिल-खिलाइत अनगुत जीनगीमे,
नजरि लगा,गुजगुज अन्हार केलक ओ॥
गिरगीट सन रूप-रङ्ग बदलि-बदलि,
नखड़ा कमेसम,लिला हजार केलक ओ॥
अपमान हमरा आ हमर निस्वार्थ प्रेमके,
चोरा-नुका कहाँ,दिने देखार केलक ओ॥
सिसा रूपी जीवन छल 'विद्यानन्द' के,
तै पर पथरे-पथर सँ प्रहार केलक ओ॥
* * *
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✍ विद्यानन्द वेदर्दी
राजविराज,सप्तरी
✍विधानन्द बेदर्दी
एक दुइ बेर नइ यौ, बारम्बार केलक ओ
हमर भावनाक साथ खेलवार केलक ओ॥
हँसैत खिल-खिलाइत अनगुत जीनगीमे,
नजरि लगा,गुजगुज अन्हार केलक ओ॥
गिरगीट सन रूप-रङ्ग बदलि-बदलि,
नखड़ा कमेसम,लिला हजार केलक ओ॥
अपमान हमरा आ हमर निस्वार्थ प्रेमके,
चोरा-नुका कहाँ,दिने देखार केलक ओ॥
सिसा रूपी जीवन छल 'विद्यानन्द' के,
तै पर पथरे-पथर सँ प्रहार केलक ओ॥
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✍ विद्यानन्द वेदर्दी
राजविराज,सप्तरी

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