मिथला में दुर्गाष्टमी........
मिथला में दुर्गाष्टमी
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संपूर्ण मिथिला में अष्टमीक पूजा श्रद्धा भक्ति पूर्वक वैदिक विधि सौं होईत अछि।षष्ठी दिन गाजा-बाजा संग भगवती के बेलक गाछक निचा पूजा कय जतय जोरा बेल रहै छैक पियर कपड़ा सौं बान्हि भगवती के निमंत्रण देल जाई छनि मंदिर पधारैक लेल तें बेलनोती कहल।सप्तमी के पुनः शंख घरिघंट सौं युक्त ओहि नोतल बेल के तोरी महफा पर भगवती के मंदिर आनल जाई छनि।भगवतीक मंदिर अबैत देरी दुर्गा स्थान में अद्भुत आध्यात्मिकताक बसात बहय लगैत अछि।दर्शनार्थी आ मेलाक आनन्दानूभूति लेपिहारच भीड़ बढय लागल।गाम-गाम सौं दर्शनार्थी सपरिवार नव-नव वस्त्राभूषन पहिरि पैदल त कियो गाडी-घोडा सौं माताक दर्शन आ मेलाक आनन्द रस लेबाक लेल निकट दुर्गा प्रांगण में अबि मेलाक छटा में अलौकिकताक वृद्धि करैत छथि।
अष्टमी दिन जगदम्बाक पूजा कय महिषाक साविध पूजा आरती कयल जाई छन्हि। ओकर बाद बलिप्रदानक कार्यक्रम होई अछि।दूर-दूर सौं भक्तगण छागर लय मंदिरक प्रांगण में भगवती के चढवै लेल आबै छथि।किनको कोबला पूर्तिक छागर त कियो ओहिना भगवती के छागर चढबै छथि।
मिथिलाक गाम-गामक सब घर में आई गोसाऊन के प्रसन्न करै हेतु पवित्र से खीर बना लडडू केराक भोग सौं पातैर देल जाई छनि। कुमारि-बटुक भोजनक सेहो प्रशस्ती अछि।सबहक ओहिठाम कुमारि कन्या के तेल लगा सिनूरक ठोप कय ससस्नेह भोजन करा खोईछ आ दक्षिणा दय भगवतीक स्वरूप बुझि प्रणाम कय ससम्मान विदा करै छथि।कुमारि भोजन में खोईछक प्रशस्ती अहिलेल छैक जे हमरो खोईछ अर्थात पति संतान धन वैभव सौं अहिना भरल पूरल रहे। ओना जिनका जहिया सम्हरै छनि दसदिन में कहियो पातैर आ कुमारि भोजन सेहो करबै छथि कियो कियो त दसोदिन कुमारि भोजन करबै छथि।मैथिल स्त्री बचिया सब उपास करई छथि ओना त बहुत मैथिल स्त्री बचियो सब दसोदिन उपास करै छथि कियो भैरदिनक उपासक बाद रात्रि में रोज भोजन करै छथि त कियो कियो रातियो में फलाहारे करई छथि।बहुत मैथिलानि सप्तमी के संध्याकाल अरबाअरबैन या फलाहार सौं खरना सेहो कय आई उपास करै छथि।
"अपन मिथिला सर्वश्रेष्ठ मिथिला"
जय माँ जगदम्बा! आहाँ के शत् शत् नमन।
जय हे मैथिल स्त्री अहूँ के मिथिला में धर्मक ज्योति
जरबै लेल शत् शत् नमन।
**सप्तमी युक्त अष्टमी उपास नै करक चाही।शुद्ध अष्टमी या नवमी युक्त अष्टमी व्रत करक चाही।
जय मिथिला जय मैथिल जय मैथिली
साभार-मिथिला पेज
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संपूर्ण मिथिला में अष्टमीक पूजा श्रद्धा भक्ति पूर्वक वैदिक विधि सौं होईत अछि।षष्ठी दिन गाजा-बाजा संग भगवती के बेलक गाछक निचा पूजा कय जतय जोरा बेल रहै छैक पियर कपड़ा सौं बान्हि भगवती के निमंत्रण देल जाई छनि मंदिर पधारैक लेल तें बेलनोती कहल।सप्तमी के पुनः शंख घरिघंट सौं युक्त ओहि नोतल बेल के तोरी महफा पर भगवती के मंदिर आनल जाई छनि।भगवतीक मंदिर अबैत देरी दुर्गा स्थान में अद्भुत आध्यात्मिकताक बसात बहय लगैत अछि।दर्शनार्थी आ मेलाक आनन्दानूभूति लेपिहारच भीड़ बढय लागल।गाम-गाम सौं दर्शनार्थी सपरिवार नव-नव वस्त्राभूषन पहिरि पैदल त कियो गाडी-घोडा सौं माताक दर्शन आ मेलाक आनन्द रस लेबाक लेल निकट दुर्गा प्रांगण में अबि मेलाक छटा में अलौकिकताक वृद्धि करैत छथि।
अष्टमी दिन जगदम्बाक पूजा कय महिषाक साविध पूजा आरती कयल जाई छन्हि। ओकर बाद बलिप्रदानक कार्यक्रम होई अछि।दूर-दूर सौं भक्तगण छागर लय मंदिरक प्रांगण में भगवती के चढवै लेल आबै छथि।किनको कोबला पूर्तिक छागर त कियो ओहिना भगवती के छागर चढबै छथि।
मिथिलाक गाम-गामक सब घर में आई गोसाऊन के प्रसन्न करै हेतु पवित्र से खीर बना लडडू केराक भोग सौं पातैर देल जाई छनि। कुमारि-बटुक भोजनक सेहो प्रशस्ती अछि।सबहक ओहिठाम कुमारि कन्या के तेल लगा सिनूरक ठोप कय ससस्नेह भोजन करा खोईछ आ दक्षिणा दय भगवतीक स्वरूप बुझि प्रणाम कय ससम्मान विदा करै छथि।कुमारि भोजन में खोईछक प्रशस्ती अहिलेल छैक जे हमरो खोईछ अर्थात पति संतान धन वैभव सौं अहिना भरल पूरल रहे। ओना जिनका जहिया सम्हरै छनि दसदिन में कहियो पातैर आ कुमारि भोजन सेहो करबै छथि कियो कियो त दसोदिन कुमारि भोजन करबै छथि।मैथिल स्त्री बचिया सब उपास करई छथि ओना त बहुत मैथिल स्त्री बचियो सब दसोदिन उपास करै छथि कियो भैरदिनक उपासक बाद रात्रि में रोज भोजन करै छथि त कियो कियो रातियो में फलाहारे करई छथि।बहुत मैथिलानि सप्तमी के संध्याकाल अरबाअरबैन या फलाहार सौं खरना सेहो कय आई उपास करै छथि।
"अपन मिथिला सर्वश्रेष्ठ मिथिला"
जय माँ जगदम्बा! आहाँ के शत् शत् नमन।
जय हे मैथिल स्त्री अहूँ के मिथिला में धर्मक ज्योति
जरबै लेल शत् शत् नमन।
**सप्तमी युक्त अष्टमी उपास नै करक चाही।शुद्ध अष्टमी या नवमी युक्त अष्टमी व्रत करक चाही।
जय मिथिला जय मैथिल जय मैथिली
साभार-मिथिला पेज



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