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अलगे चुल्हा जरेबौ गै..(मैथीलि लोक गीत)

अलगे चुल्हा जरेबौ गै..(मैथीलि लोक गीत)

✍सूरज भारती

सबटा तोहर ठेही गै बुरहिया, छण मे हेट करेबौ गै.
आ'ब दहिन मर्दावा के आई तुँ, अलगे चुल्हा जरेबौ गै..

ठुईस क सबेरे सकाल, घुमै छँ टोले टोल गै.
लुबङी मे चुबङी लगा क, खोलें हमर पोल गै..

बापक सप्पत खा क कहै छियौ, झोट्टा आई तिरबेबौ गै.
आ'ब दहिन मर्दावा के आई तुँ, अलगे चुल्हा जरेबौ गै..

भनसा जखन करमए अकेले, छुटतौ पसीना गै.
जाई छँ भसीयएल बुङहिया, तुँ त दिनो दिना गै..

खायब बनाक सेबैक खीर, तोरा मुँह तकेबौ गै.
आ'ब दहिन मर्दावा के आई तुँ, अलगे चुल्हा जरेबौ गै..

सूरज की पंचैती करतै, ओकरे देबै उकैट गै.
जौं अजैया बिच मे एतै, सौंसे लेबै बुकैट गै..

कान भैर क बुङहबोक, अपना मे पटियेबौ गै.
आ'ब दहिन मर्दावा के आई तुँ, अलगे चुल्हा जरेबौ गै......

गीतकार ÷ सूरज भारती

#अपन_मिथिला
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पोस्ट :-अशोक कुमार सहनी
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