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( गरिबकऽ जीनगि )

( गरिबकऽ जीनगि )
   
✍राजदेब राज !


पेट खालि बर्तन खालि, चुल्हि मे अाइग नै अछि !
पाइन बर्षा अबैय, शरीर ढाकऽ लेल कपडा नै अछि !!


कतऽ जाऊ कि खाऊ किनकर हाथ पकरू !
सुनसान ई जिन्गी मे किनको अास नै अछि !!


किनको पिवैला पेप्सि म्रिण्डा, कोइ पिवैय विस्कि !
भुख त्रास सँऽ मैर रहल्छी , हमरा लेल कतै पाइन् नै अछि !!


के सुनत्  बात हमर , के करत् हमर सप्पना पूरा ! 
सरकार अछि बहुत दुर हमरा सँऽ, पुगऽ लेल कोनो बाट नै अछि !!


केहन बिधना लिखलकऽ भगवान हमरा जेहन गरिब के ! 
यै दुष्ट संसार मे अप्पन कहैवाला कोई नै अछि !! 


 लेखक : ✍राजदेब राज ! 
 ठेगाना : चोहर्वा सिरहा ( नेपाल) 
 हाल : मलेसिया ।

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