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अन्पढ छलौं हम, अहाँ आखर सिखा गेलौं

।।बिछोड ---(कविता)

मैथिलि जिन्दावाद सँ फोटो
✍👤धनेश्वर ठाकुर 

भटकल छलौं हम,
अहाँ  डगर  देखा  गेलौं ।
अन्पढ  छलौं  हम,
अहाँ आखर सिखा गेलौं ।।

फंसाक प्रेमक जालमे,
नेहक डोर तोडि गेलौं ? ।
जियकें सिखाक जिनगिमे,
माहुर  किय घोंइर गेलौं ? ।।

संगे  लजैतौं  बितल क्षण,
सपनमे  आबि  किय,
ऐना     सताबै     छि ।
सुतलौंमे किय जगलौंमे किय,
करेज धडका..... धडका,
खुनके आँसु कनाबै छि ।।

नेहक डोर ,
बडा नाजुक होइत अछि 
सुनने    छलौं     हम ।
मुदा एकरा कोइ,
तोडि नहिं सकैय तेहन,
विश्वास कैने छलौं हम ।।

कसुर हमर कि छल ?
बस हम गरिब छलि ।
दौलतमे नसायल प्यार,
निभायब नै सकली,
हम बहुत बेनसिब छली ।।

वाह गे दिलतोरनी .... वाह !
खुब निभौले तों संग ,
हमर दुवा तोरा जिनगिमे
कखनो हार नै हौउ ।
हमरतँ जेना तेना,
अहि जन्म कि , तोरा सातो जन्म नै
किन्कोसँ प्यार हौउ ।।

अदि भैयो जाउ प्यार,
हमरा जिका केकरो
सरियाम नै करि हे ।
प्यार कोनो नाटक नै अछि,
बिच बजारमे बदनाम नै करि हे ।।
..........

✍   धनेश्वर ठाकुर 
धनुषा धाम 4 लक्ष्मीपुर 
हाल मरूभुमी देश 
दोहा कतार


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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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