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दीप सन जरि उठै विहान बनिक'रह

दीप सन जरि उठै विहान बनिक'रह 


✍👤मैथिल प्रशान्त

चान छेँ तों चान चान बनिक' रह 
दर्द दै छेँ दे मुदा आन बनिक' रह 

आँगुर पकरि चलबौ नञि जानिले 
बाटकेँ रोड़ा नञि निशान बनिक' रह 

जे हल्लुक रहै ओ सभ उड़ि गेलै 
खखरी कहाँ धान छेँ धान बनिक' रह 

सिंगरहार जँका खस लोढा जेबेँ 
फूल बनिक' रह पाषाण बनिक' रह 

बहुत रास लतीकेँ सहारा तोहर चाही 
कान्ह छौ मजगूत मचान बनिक' रह 

गैर गेलैए खैक सन किछु हमर करेजमे 
दीप सन जरि उठै विहान बनिक' रह 

~✍ मैथिल प्रशान्त 
  दुर्गौली, बेनीपट्टी ।


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पोस्ट:- अशोक कुमार सहनी

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