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#लप्रेक-

लप्रेक-

✍👤रंजीत कुमार झा

-हे गै रूब्बी, सुन ने हमरा संगे कलकत्ता भागि कॅ चलबें।
-गे दाई ....गे दाई....रौ हमर मोन पतियबै छैं। एकटा अलता अानल पारे नै लागै छनि आ यैह लॅ जाइ छथि कलकत्ता।
-गै हमर रानी, तु अलता'क गप्प करै छैं आ हम तोरा लेल सीन्नुर कि'न कॅ रखने छी, आ ने तोहर मांग के सिनुरिया कॅ दियौ।
-मैए गै ........
-आ...हा....हा.... एना लजा कियै गेलैं गै, हम'र फुलकुमारी।
-रौ हमर मांग सिनुरिया तॅ बाद में करिहैं मुदा तोहर मांग आइ लाले लाल बुझ।
-ओ हो...... बुझि गेलियौ.......बुझि गेलियौ.....हे ले हम'र कपार आ कॅ दही ......लाले.......लाल।
-रे बाउ आइ लाल हम नहिं, पाछा घुमि कॅ देखहि हम'र बरका भइया लाठी नेने इम्हरे अबै छौ!
- बाप रे...हे हम आब पोखरि में कुदलियौ...

"रंजीत कुमार झा" //


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पोस्ट:- अशोक कुमार सहनी
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