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टुकड़ी करेजक, आन भेलौ मा गे

टुकड़ी करेजक, आन भेलौ मा गे

✍👤मैथिल प्रशान्त 

एक छनमे बेटी, विरान भेलौ मा गे
टुकड़ी करेजक, आन भेलौ मा गे

जाहि आँगनमे मा, देलियै ठेहुनिञा ।
चुटकी भरि सेनूर, बदलल दुनिञा ।।
फूल सन बेटी, पाषाण भेलौ मा गे ।

बिसरि जाउ कोना, बाबूकेँ कोरा ।
आबथि बजारसँ, हमरे देथि झोरा ।।
सम्पति, खोइछक धान भेलौ मा गे ।

ककुलति क' क' ,भैयोकेँ सुनेलयनि ।
नञि जाएब सासुर ,भौजीकेँ कहलयनि ।।
जाइ छौ दुलरी, द्वितीयाक चान भेलौ मा गे ।

लेखकः👤✍मैथिल प्रशान्त
  दुर्गौली, बेनीपट्टी ।

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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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