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धन धन्य मिथिला धन्य मैथिल भूमि पावन धन्य हे

धन धन्य मिथिला धन्य मैथिल भूमि पावन धन्य हे



✍👤राजीव रंजन मिश्र


धन धन्य मिथिला धन्य मैथिल भूमि पावन धन्य हे।
नर रूप विद्यापति त' नारी भारती चैतन्य हे।
मिथिलाक महिमंडन करथि ज्ञानी गुनी मूर्धन्य हे।
मंडन अयाँची याज्ञवल्कक कर्म अति करमन्य हे।।

राजा जनक रानी सुनयना धर्म करमक साधना।
तनिकर सुता माते सिया शुचि ज्ञान बाटक चेतना।।
दशरथ अवधपति धर्मनिष्ठ विवेक सुधि-बुधि धारणा।
सुत चारि राम विशेष प्रिय हियमे भरल सदभावना।।

जगदीश छथि रघुवंश भूषण,जग जननि माँ जानकी।
जय जय मनाबी साँझ भिनसर,साम दाम निधानकी।।
संसार सागर बाट दुर्गम,चल अचल गतिमान की।
करुणा भरल श्री राम राघव, धीर गति मति जानकी।।

रघुवीर अनमन चन्द्रमा सन जानकी छवि चानिनी।
मैथिल नयन अंजन प्रभू मिथिला सुता जग तारिणी।।
अवधेश श्यामल मेघ घुमरल छथि सिया सौदामिनी।
लखि रूप अनुपम हारि बैसल सोह मैथिल भामिनी।।

पचमीक तीथि पुनीत पावन दिन सुमंगल शानके।
पुलकित नगर नर नारि लखि परिणय सिया संग रामके।।
कण कण सुवासित भव्य शोभित पुर जनकपुर धामके।
राजीव अपरुप रूप छवि जोड़ी नयन अभिरामके ।।

✍👤 राजीव रंजन मिश्र


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पोस्ट:-अशोक कुमार सहनी
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