❤ बीहनि प्रेम कथा 💞 पूनर्मिलन
❤ बीहनि प्रेम कथा
💞 पूनर्मिलन
✍👤वी. सी. झा "बमबम"
१.)
सुन्दर सन भोरक अनुपम बेला छैइक ! पुष्प अपन वाटिका मे सबतरि सीनेहक सुगंधि पसारि रहल अछि ! चिड़ैं - चूड़मुन्नी'क रुप मऽ जेना स्वयं भारती आबि सुमधुर प्रेम-प्राती गावी रहल होथि ! लगैछ जेना अखनहि ऋतुराजक आगवन भेले हो तहिना , हृद्य आंनदित करयवला गंधतृण वातावरण मेऽ अकाएक पसरि गेलहि !
शायद ओ दुहू अत्यन्त मनोरम चित्ताकर्षक ऋषिकुमार सन वालक जे फूलवारी मेऽक्रम संऽ फूल लोढ़ि रहल अछि तकरे प्रभाव नहि तऽ अछि कि ? आगू - आगू कुसुम तरु स्वहृदय आनंदित करैत कल्ली सुमन कैंऽ पूर्ण यौवन युक्त उनमत्त कय पाद स्पर्श करऽ चाहि रहल छैइक ! ताहि मे सुरभि समीर से ओकर संग देमऽ लेल बेर - बेर आग्रह सेहो कऽ रहल छैइक ! तऽ एम्हर आदित्य अपन रुचि'क संग पूूबरिया हाता सऽ हुलकी देवा'क प्रयत्न मऽ लागल अछि परंच अनायास चाँदनी आबि अपन आभा छिटकाबऽ लगैत अछि जेऽ बेर - बेर अरुण रश्मि के आबऽ देमऽ संऽ रोकि रहल होऽ तथापि ओ अपन स्वामी संऽ भेंट करवा'क उदृत अछि !
जेना परम् ब्रह्म सब एतहि एकटकी लगौने होथि लोचन लाभ करवा'क उदेश्य संऽ, इ क्षण देखवा'क लेल तऽ इन्द्र सेहो ललाइत भऽ उठल हेताह !
२.)
आब एम्हर महिकुमारी सेहो अपन सखी बहिनपा' संग सजि - धजि कैंऽ गौरी मंदिर जयवा क्रम मऽ फूल लोड़ैत - बीछैत ओहि दिशा मे चलल आवि रहल छथि जेमहर सुन्दर सन दुहू वालक फूल चूनि रहल छल ! सम्पूर्ण श्रींगार युक्त सखि सब पयर मऽ नूपूर नाँक मऽ नासामणि खादी रुकम, भूजबंद , कंगन ,कर्णफूल , चूरामणि सऽ परिपूरित अनंत दिव्य स्वरुपा तरुणमूर्ति सब मिथि'क संग चौल कऽ रहल आवि रहल छलिह !
आय सत् कोटि बरर्ख'क बाद प्रकृत केंऽ इ सौभाग्य प्राप्ति'क सदृश्य अनुभव भऽ रहल छलैक ! ओहो आय श्रींगार रश मे बोरा गेल अछि !
साहसा पूर्व प्रेम-प्रविण एक दोसर कैंऽ परस्पर सतृष्ण नेत्र संऽ निहारि रहल छथि ! एहि क्षण राम - रमा दुहू केंऽ दृष्टि तेना बन्हा गेलनि जे सब किछु बिसरि गेलाह होथि ! तत्क्षण सखि - बहिनपा आओर अनुज सब कियो सिनेहक बाढ़ि मे भसिया गेलाह ! इ क्षण देखि शचि आ रति सेहो पूनि - पूनि लज्जित भऽ उठल हेती !
एहि असीम प्रेमक वर्णन करवा मेऽ स्वयं ब्राह्मणी असोथकित छथि तऽ हुनक पूत्र 'विद्या' कि करत ?
💘 ✍👤वी०सी०झा"बमबम"
कैथिनियाँ
हिन्ट :-
आदित्य = सूर्य
रुचि = रोशनी
ऋतुराज = बसंत
कुसुम तरु = फूल'क गाछ
कल्ली = अविकशित फूल
सुमन. = पुष्प
पाद = पैर
भारती = सरस्वती
आभा = प्रकाश
चित्ताकर्षक = सुन्दर ( चित्त के अपना दिस करय बला )
अरुण रश्मि = सूर्य किरण
सुरभि समिर = मधुर हवा
लोचन. = आँखि
श्री = सीताजी
मिथि = जानकी
असिम = अनंत
गंधतृण = सुगंधि
ब्राह्मणी = सरस्वती
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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💞 पूनर्मिलन
✍👤वी. सी. झा "बमबम"
१.)
सुन्दर सन भोरक अनुपम बेला छैइक ! पुष्प अपन वाटिका मे सबतरि सीनेहक सुगंधि पसारि रहल अछि ! चिड़ैं - चूड़मुन्नी'क रुप मऽ जेना स्वयं भारती आबि सुमधुर प्रेम-प्राती गावी रहल होथि ! लगैछ जेना अखनहि ऋतुराजक आगवन भेले हो तहिना , हृद्य आंनदित करयवला गंधतृण वातावरण मेऽ अकाएक पसरि गेलहि !
शायद ओ दुहू अत्यन्त मनोरम चित्ताकर्षक ऋषिकुमार सन वालक जे फूलवारी मेऽक्रम संऽ फूल लोढ़ि रहल अछि तकरे प्रभाव नहि तऽ अछि कि ? आगू - आगू कुसुम तरु स्वहृदय आनंदित करैत कल्ली सुमन कैंऽ पूर्ण यौवन युक्त उनमत्त कय पाद स्पर्श करऽ चाहि रहल छैइक ! ताहि मे सुरभि समीर से ओकर संग देमऽ लेल बेर - बेर आग्रह सेहो कऽ रहल छैइक ! तऽ एम्हर आदित्य अपन रुचि'क संग पूूबरिया हाता सऽ हुलकी देवा'क प्रयत्न मऽ लागल अछि परंच अनायास चाँदनी आबि अपन आभा छिटकाबऽ लगैत अछि जेऽ बेर - बेर अरुण रश्मि के आबऽ देमऽ संऽ रोकि रहल होऽ तथापि ओ अपन स्वामी संऽ भेंट करवा'क उदृत अछि !
जेना परम् ब्रह्म सब एतहि एकटकी लगौने होथि लोचन लाभ करवा'क उदेश्य संऽ, इ क्षण देखवा'क लेल तऽ इन्द्र सेहो ललाइत भऽ उठल हेताह !
२.)
आब एम्हर महिकुमारी सेहो अपन सखी बहिनपा' संग सजि - धजि कैंऽ गौरी मंदिर जयवा क्रम मऽ फूल लोड़ैत - बीछैत ओहि दिशा मे चलल आवि रहल छथि जेमहर सुन्दर सन दुहू वालक फूल चूनि रहल छल ! सम्पूर्ण श्रींगार युक्त सखि सब पयर मऽ नूपूर नाँक मऽ नासामणि खादी रुकम, भूजबंद , कंगन ,कर्णफूल , चूरामणि सऽ परिपूरित अनंत दिव्य स्वरुपा तरुणमूर्ति सब मिथि'क संग चौल कऽ रहल आवि रहल छलिह !
आय सत् कोटि बरर्ख'क बाद प्रकृत केंऽ इ सौभाग्य प्राप्ति'क सदृश्य अनुभव भऽ रहल छलैक ! ओहो आय श्रींगार रश मे बोरा गेल अछि !
साहसा पूर्व प्रेम-प्रविण एक दोसर कैंऽ परस्पर सतृष्ण नेत्र संऽ निहारि रहल छथि ! एहि क्षण राम - रमा दुहू केंऽ दृष्टि तेना बन्हा गेलनि जे सब किछु बिसरि गेलाह होथि ! तत्क्षण सखि - बहिनपा आओर अनुज सब कियो सिनेहक बाढ़ि मे भसिया गेलाह ! इ क्षण देखि शचि आ रति सेहो पूनि - पूनि लज्जित भऽ उठल हेती !
एहि असीम प्रेमक वर्णन करवा मेऽ स्वयं ब्राह्मणी असोथकित छथि तऽ हुनक पूत्र 'विद्या' कि करत ?
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| लेखकः✍ vidhya chandra jha जी |
💘 ✍👤वी०सी०झा"बमबम"
कैथिनियाँ
हिन्ट :-
आदित्य = सूर्य
रुचि = रोशनी
ऋतुराज = बसंत
कुसुम तरु = फूल'क गाछ
कल्ली = अविकशित फूल
सुमन. = पुष्प
पाद = पैर
भारती = सरस्वती
आभा = प्रकाश
चित्ताकर्षक = सुन्दर ( चित्त के अपना दिस करय बला )
अरुण रश्मि = सूर्य किरण
सुरभि समिर = मधुर हवा
लोचन. = आँखि
श्री = सीताजी
मिथि = जानकी
असिम = अनंत
गंधतृण = सुगंधि
ब्राह्मणी = सरस्वती
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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