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#मैथिली_लप्रेक

#मैथिली_लप्रेक


✍👤शयम झा

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-विद्या! सुनु प्रगति मैदान मे फेर सँ पोथी मेला लागि रहल छइ , अहि बेर जेबो करबै की?
-कमल आब जा क' की करबै? 
-ओत' अहाँक संग भरि दिन संग रहै क' लेल भेटएत अछि।
-जनतब अछि नेँ, अपना सब अगले महिने एक होमे जा रहल छी।
-त' अहाँ नहि जाएब हमरा संगे?
-जइयो क' की फायदा अहाँ त' ओतहियो भरि दिन किस्से सब मे सन्हाएल रहैत छी? अहाँक हमरा सँ बेसी वैह निक लागए य' न'?
-नहि नहि ! किस्सा नै कविता।
-वैह! किस्सा रहे वा कविता हमरा लेल त' सौतिने न' जे हमर समय लै य'। चलु एगो बात पुछु सच सच कहब?
-हँ हँ ! हम अखन धरि फुस्सी बजलँहु जे आब बाजब।
-फेर कहु , हमरा या पोथी क' बेसी प्रेम करैत छिए 
-जे असगरे मे पढ़ैय लेल देर तक भेट जाए।
-चलु फेर कहु हमर मुँह देख की पढलिए?
-बाबू हम अहाँक मुँह पढ़ैत काल अहाँक आँखिक ताल मे मे डूबी जाएत छी।

-चुप रहु, अहूँ छी नेँ, हमेशा प्रेम मे डूबले रहैत छी, देखब वियाह केर बाद कमल सँ कमला नेँ बनी जाएब जे आब बरखे मे बहैत छइ।
-भक्क!!!
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लेखकः ✍👤श्याम झा





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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी

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