विरह-वियोग
*****विरह-वियोग******
✍👤सागर नवदीया
हमर करेजा किया अहाँ तोड़ि देलँहु ?
की छल हमर दोख ?
इएह ने जे हम अहाँ सँ प्रेम केलँहु ..
अहीं निसाफ करू हे प्रिय !
कोढ़ सँ कोंढ़क मिलन अपराध छै ?
आकि मोन सँ मोनक ?
किएक प्रेमक एहि फुलवारी केँ बंजर बना छोड़ि देलँहु ?
हमर करेज किएक अहाँ तोड़ि देलँहु ?
प्रिये, दराइर फाटल करेजकेँ
अहीं टा पाटि सकैत छी !
हमर जिनगी घुना गेल अछि ,
कौखन देबार लागि गेल ?
की घुन खा गेल ?
प्रेमक अहि गाछक ...
कष्टक अहि बाढ़ि मे फँसल छी
कतs-कतs भसिया रहल छी नहि जानि !
मानै छी प्रेमक ओ उम्र छल ...
थूर्रि लताम जकाँ
मुदा आब पाकि गेलहुँ ...
अहाँ आउ ने ,हम पाकि रहल छी
समाजक एहि कुरीति मे जड़ि रहल छी
दरदक फोंका आब फुटि रहल अछि
अच्छा ....
अहाँ केँ मोन पड़ल ओ !
भक्क इजोरिया राति ?
अपने दुनु गोटे जे कनैत छलँहु ...
हे पैच दs दियs ,थोड़बे नोर -
पजरल करेजाक आगि केँ
मिझएबाक लेल ...
हे मृगनयनी ,हे रूपवती,हे चंद्रमुखि ...
खेतक दरेग मेघे टा बुझि सकैत अछि
पछवा बसात जकाँ ई समाज
कान लग घूमि रहल अछि ....
बर कटैत अछी ,चकता भs गेल अछि
लहरि रहल अछि ....
तैइयो हम जागल छी
अहाँक बाट जोहि रहल छी ...
हमरा इहो बुझल अछि ..
सामाजक कुरीति ,कुविचार,
दुनू गोटे केँ एक नहि होबए देत
तें कोनो बात नहि ..
दैबक घरो मे हम अहाँक बाट हेरब
हम अहाँक नुपूरक गीत गाएब ..........
अहाँ एबै !
एबै ने अहाँ ?
लेखक -सागर नवदीया(क्रांतिकारी)
संशोधन-विकास भैया
💟💟💟💟💟💟💟💟💟💝💝💝💝💝
पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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✍👤सागर नवदीया
हमर करेजा किया अहाँ तोड़ि देलँहु ?
की छल हमर दोख ?
इएह ने जे हम अहाँ सँ प्रेम केलँहु ..
अहीं निसाफ करू हे प्रिय !
कोढ़ सँ कोंढ़क मिलन अपराध छै ?
आकि मोन सँ मोनक ?
किएक प्रेमक एहि फुलवारी केँ बंजर बना छोड़ि देलँहु ?
हमर करेज किएक अहाँ तोड़ि देलँहु ?
प्रिये, दराइर फाटल करेजकेँ
अहीं टा पाटि सकैत छी !
हमर जिनगी घुना गेल अछि ,
कौखन देबार लागि गेल ?
की घुन खा गेल ?
प्रेमक अहि गाछक ...
कष्टक अहि बाढ़ि मे फँसल छी
कतs-कतs भसिया रहल छी नहि जानि !
मानै छी प्रेमक ओ उम्र छल ...
थूर्रि लताम जकाँ
मुदा आब पाकि गेलहुँ ...
अहाँ आउ ने ,हम पाकि रहल छी
समाजक एहि कुरीति मे जड़ि रहल छी
दरदक फोंका आब फुटि रहल अछि
अच्छा ....
अहाँ केँ मोन पड़ल ओ !
भक्क इजोरिया राति ?
अपने दुनु गोटे जे कनैत छलँहु ...
हे पैच दs दियs ,थोड़बे नोर -
पजरल करेजाक आगि केँ
मिझएबाक लेल ...
हे मृगनयनी ,हे रूपवती,हे चंद्रमुखि ...
खेतक दरेग मेघे टा बुझि सकैत अछि
पछवा बसात जकाँ ई समाज
कान लग घूमि रहल अछि ....
बर कटैत अछी ,चकता भs गेल अछि
लहरि रहल अछि ....
तैइयो हम जागल छी
अहाँक बाट जोहि रहल छी ...
हमरा इहो बुझल अछि ..
सामाजक कुरीति ,कुविचार,
दुनू गोटे केँ एक नहि होबए देत
तें कोनो बात नहि ..
दैबक घरो मे हम अहाँक बाट हेरब
हम अहाँक नुपूरक गीत गाएब ..........
अहाँ एबै !
एबै ने अहाँ ?
लेखक -सागर नवदीया(क्रांतिकारी)
संशोधन-विकास भैया
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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