अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो
अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो
( कविताधन- भीमनाथ झा )
अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो
तखन दू सय ग्रन्थ दोसरमे लिखब
पढ़ब पहिने अपन वानिक शब्द दू
तखन दू सय आन भाषाकेँ सिखब
जनक ओ सीताक अइ भूखण्डमे
रहत नहि कहियो कमी प्रतिभाक हे!
करब एतबेटा अहाँसभ, ओ न हो
भ्रमित, रक्षा करब निज आभाक हे !
एहि ठामक दिव्य प्रतिभा- पुत्रकेँ
कते वंचक लेत अपनामे मिला
सावधान! न हो सफल से वंचना
अन्यथा ढहि जैत निज भाषा- किला
मैथिलीकेँ पुनः हरि लेबाक हित
रहल अछि मरडाय रावण- सूत कते
अहाँ सभ दर चोट डंकापर कहू -
छी जते हमसभ, बुझह- लव कुश तते
नहि मनायब हमर केओ स्मृतिदिवस
करब नहि कहियो हमर अभ्यर्थना
जनिक पदपर दूबि- अक्षत देल हुय
करब तनिके सभगोटे मिलि अर्चना
अपन संस्कृति- सभ्यता- रक्षाक हित
अहाँसभ नित अमल शतदलवत खिली
मैथिलीक श्रृंगार हो नित अभिनवे
यैह अछि मनकामना, जय मैथिली
( कविताधन- भीमनाथ झा )
साभार :- अखेलिश झा जी
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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( कविताधन- भीमनाथ झा )
अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो
तखन दू सय ग्रन्थ दोसरमे लिखब
पढ़ब पहिने अपन वानिक शब्द दू
तखन दू सय आन भाषाकेँ सिखब
जनक ओ सीताक अइ भूखण्डमे
रहत नहि कहियो कमी प्रतिभाक हे!
करब एतबेटा अहाँसभ, ओ न हो
भ्रमित, रक्षा करब निज आभाक हे !
एहि ठामक दिव्य प्रतिभा- पुत्रकेँ
कते वंचक लेत अपनामे मिला
सावधान! न हो सफल से वंचना
अन्यथा ढहि जैत निज भाषा- किला
मैथिलीकेँ पुनः हरि लेबाक हित
रहल अछि मरडाय रावण- सूत कते
अहाँ सभ दर चोट डंकापर कहू -
छी जते हमसभ, बुझह- लव कुश तते
नहि मनायब हमर केओ स्मृतिदिवस
करब नहि कहियो हमर अभ्यर्थना
जनिक पदपर दूबि- अक्षत देल हुय
करब तनिके सभगोटे मिलि अर्चना
अपन संस्कृति- सभ्यता- रक्षाक हित
अहाँसभ नित अमल शतदलवत खिली
मैथिलीक श्रृंगार हो नित अभिनवे
यैह अछि मनकामना, जय मैथिली
( कविताधन- भीमनाथ झा )
साभार :- अखेलिश झा जी
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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