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अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो

अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो

  
 ( कविताधन- भीमनाथ झा )


अपन भाषामे लिखब दू पाँतियो
तखन दू सय ग्रन्थ दोसरमे लिखब
पढ़ब पहिने अपन वानिक शब्द दू
तखन दू सय आन भाषाकेँ सिखब

         जनक ओ सीताक अइ भूखण्डमे
          रहत नहि कहियो कमी प्रतिभाक हे!
          करब एतबेटा अहाँसभ, ओ न हो
           भ्रमित, रक्षा करब निज आभाक हे !

एहि ठामक दिव्य प्रतिभा- पुत्रकेँ
कते वंचक लेत अपनामे  मिला
सावधान! न हो सफल से वंचना
अन्यथा ढहि जैत निज भाषा- किला

              मैथिलीकेँ पुनः हरि लेबाक हित
              रहल अछि मरडाय रावण- सूत कते
              अहाँ सभ दर चोट डंकापर कहू -
               छी जते हमसभ, बुझह- लव कुश तते

नहि मनायब हमर केओ स्मृतिदिवस
करब नहि कहियो हमर अभ्यर्थना
जनिक पदपर दूबि- अक्षत देल हुय
करब तनिके  सभगोटे मिलि अर्चना

             अपन संस्कृति- सभ्यता- रक्षाक हित
             अहाँसभ नित अमल शतदलवत खिली
             मैथिलीक श्रृंगार हो नित अभिनवे
             यैह अछि मनकामना, जय मैथिली

                       ( कविताधन- भीमनाथ झा )

साभार :- अखेलिश झा जी
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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