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मैथिली लोकगीत आ मैथिलानी

मैथिली लोकगीत आ मैथिलानी


✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

ओना कहल जाइत छैक जे 'सोहर सँ जे लोकगीत प्रारम्भ होइत अछि से समदाउन' में जाक पूर्ण भ जाइत अछि। मुदा बच्चा के गर्भादान सं लक मृत्यु धरि गीत गेबाक आ सुनबाक परंपरा अपन मिथिला में रहल अछि। गीत आ फकरा संगे-संगे चलैत अछि। एक दोसरक पूरक बनल रहैत अछि। गीत भगबान अथवा भगबती के पूजा करक, मनेबाक साधन बनि जैत अछि। गीत विध वेभारक गाइडलाइन्स बनि जैत छैक। गीत समय के साक्षी भ जैत छैक। गीत श्रृंगार के व्यक्त करबाक हथियार बनि जैत छैक। गीत बर कनिया के प्रेम, सौन्दर्य, रति क्रिया में पैघ सहायक बनि हनीमून केर व्योंत भ जैत छैक। गीत नव वर कनिया के आपसी मिलन केर आधार भ जैत छैक। गीत बुढ स्त्रिग्न आ पुरुष के अंत समय के प्राती, कीर्तन आ भजन के रूप में जीबाक आ मृत्यु के सहजता सं स्वीकार करबाक साधन बनि जैत छैक। गीत दैनिक जीवन के काज जेना रोपनी, कमौनी, कुटान, पिसान, अरिपन, कोहबर रंगब, मैथिली चित्रकला के प्रयोग में लयात्मकता आनि दैत छैक।  गीत धरती, नदी, पोखरि, इनार, गाछ, बृक्ष, चिरै, चुनमुन, संगे मनुखक प्रेम आ एक दोसरक प्रति परस्पर सहयोग केर भान छैक। गीत ओहि बिरहिनी नायिका के जकर पति बिदेस अर्थात गाम सं बाहर गेल छैक तकरा लेल दोसरातिक काज करैत छैक। गीत गर्भवती महिला के मोन बह्लाबैत ओकरा बच्चा के छवि के दर्शन करबैत आधार छैक। गीत एक विधवा के अपन जिनगी काटक औजार छैक। गीत कला छैक। कला में सर्वश्रेस्ट कला छैक। गीत गरीबी, दुःख, बिछोह आदि सह्बक साधन छैक। गीत प्रेम आ अनुराग छैक। गीत नवरस सं भरल छैक। गीत छैक त मनुख छैक  गीत छैक त जहान छैक। गीतक संसार अनंत संसार छैक।

मैथिली लोकगीतक संसार स्त्रीगणक संसार थिक। पुरुष पक्षक भूमिका गीत निर्माणक आओर किछु गीतक गायन तक सिमित अछि। मैथिलानी एक बेर अर्जित कयल गेल अमूर्त धरोहर जेनाँकि गीत-नाद, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, व्रत-निष्ठा, कथा-पीहानी; अरिपन काढ़ब, ठांव निपब, कोबर लिखब; केथरी, सुजनी सीयब; सीकीसँ पौती-मौनी बुनब, माटिक महादेब, सामा-चकेबा, खेलोना, कोठी, चूल्हा आदि बनेबा, जांत पिसब, उखडि, ढेकी कुटब, आदि अनेको तरहक परंपरा कें अपन माय, पितियाईन, दाई, नानी, सासु आदिसँ सिखैत छथि आओर फेर अपन सभटा लुइरकें अपन बेटी, पूतहु, पोती, नातिन आदिकें अदौसँ एहि कलाकें पीढ़ी दर पीढ़ी नीक जेकाँ सिखेबाक परंपराकें हस्तारंतरित करैत निमाहि रहल छथि। हलांकि आधुनिकता आ उपभोक्तावादक  युगमे एहि परंपराक पतन भेल जा रहल अछि परञ्च मूल भावमे थोर बहुत जोड़-तोड़क संग ई परंपरा अपन मिथिला समाजक महिला वर्गमे एखनो शाश्वत अछि।

नारी मनोदशा केर चित्रण लोकगीत केर माध्यम सं अहि लेल जरुरी अछि जे अपन भाव, दर्द, प्रेम, स्वतंत्रता, मनोद्वेग, सौन्दर्य केर अनेक स्वरुप मैथिलानी लोकगीत के माध्यम सं अदौं स करैत आबि रहल छथि। गीत गेबाक लेल हिनका हेतु कोनो विशेष क्षण नहि छनि। अपन हरेक क्रिया कलाप में ई गीत गबैत छथि। काज में गीतक संग रसिया जाइत छथि। काज कखन पूरा भ जाइत छनि से पते नहि चलैत छनि। काजक अधिकता सेहो हिनकर गीत गेबाक, गीत में संग देबाक आ गीत सुनबाक प्रवृत्ति के कम नहि करैत छनि। ओ सब अव्यक्त भाव जे कोनो ने कोनो कारणे आन ठाम मैथिलानी व्यक्त नहि क पबैत छथि से गीतक सहारे व्यक्त क लैत छथि। मोन हल्लुक क लैत छथि। मैथिली लोकगीत अछियो त महासमुद्र। कतबो जमा क लेब, लिख लेब तैय्यो बहुत रास रहिये जैत। आ लोकगीत केर अपार क्षेत्र संपदा पर अगर मोटा मोटी आंकड़ा के बात करी त अनुमानन ७५ प्रतिशत हिस्सा केर स्वामिनी अथवा अधिकारनी मैथिलानी छथि। ई अनुपात अगर सब जाति छोडि ब्राह्मण आ कायस्थ में देखब त लागत जे ८५ आ १५ के अछि। मतलब भेल जे लोकगीत केर ८५ प्रतिशत सम्पदा पर स्त्रिग्न आ १५ प्रतिशत सम्पदा केर अधिकारी पुरुष छथि। एहो बुझनाई आवश्यक जे मैथिली लोकगीत आ मैथिली भाषा में लिखल लोकगीत दू अलग-अलग तरहक श्रेणी अछि। जखन हम सब कहैत छी जे मैथिली लोकगीत त ओहि में मैथिली भाषा में लिखल, गैल आ श्रवण परंपरा सं अबैत गीत सब के अलावे अन्य भाषा, मुख्यतः भोजपुरी, मगही, ब्रजबोली मिश्रित सेहो आबि जैत अछि। कतेको गीत भाषा के बान्ह तोडि बहै लगैत अछि। एकै गीत में हिंदी, मैथिली, भोजपुरी सब भेट जैत, मुदा लागत कर्णप्रिय। 

मैथिलानी के दर्द आ व्यथा के बात चाहे पुरुष करैत हो या स्त्रीगन मैथिलानी सब अपना आपके ओकरा संगे कनेक्ट क लैत छथि। विषय किछु हो, ओकरा अपना जीवन आ भाग्य सं जोडि लैत छथि। शब्द ठोर सं आ भाव नोर सं बहए लगैत अछि – लगातार, बारम्बार।।

✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र


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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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