सीता दाई केर वेदना: जेना माए कहलिन
सीता दाई केर वेदना: जेना माए कहलिन
✍👤Kailash kumar mishra
राम बियाहने कुन फल भेल/
सीता जन्म अकारथ गेल/
जखन कखनो सीता जी के चर्चा होयत छल त माए रटल सुग्गा जकां एहि फकरा के पढ़े लागैत छलीह. आय सोचल माए केर बात मित्र लोकनि स क ली.
कखनो काल जखन माय तंग भ जैत छलीह त अनायास दोदिल होइएत कहैत छलीह:
“फाटू हे धरती”.
एकर बाद सब बुइझ जैएत छल जे माय आब तामसे घोर छथि. फेर हुनका कियोक किछु नहि कहैत छलनि. मुदा हमर नेनमति देखू हमरा होइएत छल माय फाटू हे धरती कथी लेल कहैत छथि. एक दिन जखन माय केर मोन शांत रहनि त बाल सुलभ जिज्ञासा कैल:
“माय, अहाँ फाटू हे धरती कियैक कहैत छियैक?”
माय कहली: “की कहु बाऊ, नारीक स्थिति एखनो सीता दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में. सीता के राम संगे विवाह भेलनि. लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह. राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक. दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि. जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह. मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि. जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि. सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि . सीता माला रामक गरदनि में डाले लगली. हठात सीता के सब सीतक हाथ अपना दिस खीच लेलनि. राम अक्चेकायल रहि गेलाह.
सखी सब कहलथिन : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि. अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी. मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि. अतए महिला सहचरी छथि. अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन. जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन. यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन. फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल. काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै.”
राम चिंता में आबि गेलाह . कहलथिन : “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी. मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी.”
सीताक सखी सब तखन कहलथिन: “ तखन सुनु. अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब!”
राम बजलाह : हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब.
फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि.
विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह. राम संगे बने बने घुमली. रावण हरण कै लंका ल गेलनि. अशोकक गाछ लग समय कटली. राम राम कहैत रहली. सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि. कहिओ कुनो शिकायत नहि. वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली.
जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन. कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्म शाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही. बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक?
अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि. अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह.
खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन. लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन. एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि. वनक लोक सब मदति केलकनि. इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी. मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक. हजमा के कहलथिन “तों भरत, के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि.”
जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि. राम के अपन वचन स्मरण भेलनि. कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब. तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता. सैह भेल.
मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन. सब हारि गेलाह. हनुमान बंदी भ गेलाह. अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह. राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह. कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू. सीता मना क देलथिन. राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि. मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली. अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत.”
सीता: “से कोना?”
राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि.”
सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?”
राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी.”
सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक ?”
ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ी करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी. अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी. आब हमर आत्मा कानि रहल अछि. अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय! “
धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दराक्का भ गेले. जाबेत राम रोक्थिन ताबेत सीता ओही धरती में बिलुप्त भ गेलीह.
ई बात कहि माए कनि जोर स सास लेलीह आ कहलनि “ बाऊ ताहि जखन हमरा सबके कोनो कष्ट होइएत अछि त अपना के सीता बुझैत छी आ अनायास मुह स निकलि जैत अछि : “फाटू हे धरती” .
ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि. अपमानित होइएत छथि. बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि. वेदना अनंत अछि.....”
ई बात कहैत माय केर नयन नोर स भरि गेलनि. ओहि क्षण त नेना रही आब बुझै छी जे माय के नोर कोना खसलनि!!!
थोरेकबे क्षण पहिने Kamini Kamini जी केर एक लघु कविता सीता पर पढल त लागल जेना हमर माय केर विचार स कतेक साम्य रखैत छथि! हुनकर लघु कविता नीचा में देल अछि:
हे ! जनक नन्दनी जनक दुलारी
जन -मन के अहाँ वासी ।
ई जानी लिय हे मातु जानकी
घर घर मे व्याप्त उदासी ।
आई एक रावण नहि एक सीता
पूरा समाज मयावी ।
घर -घर आई लंका बनल अछि
ककरा अपन व्यथा सुनावी ।
लेख साभार :- kailash kumar mishra
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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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✍👤Kailash kumar mishra
राम बियाहने कुन फल भेल/
सीता जन्म अकारथ गेल/
जखन कखनो सीता जी के चर्चा होयत छल त माए रटल सुग्गा जकां एहि फकरा के पढ़े लागैत छलीह. आय सोचल माए केर बात मित्र लोकनि स क ली.
कखनो काल जखन माय तंग भ जैत छलीह त अनायास दोदिल होइएत कहैत छलीह:
“फाटू हे धरती”.
एकर बाद सब बुइझ जैएत छल जे माय आब तामसे घोर छथि. फेर हुनका कियोक किछु नहि कहैत छलनि. मुदा हमर नेनमति देखू हमरा होइएत छल माय फाटू हे धरती कथी लेल कहैत छथि. एक दिन जखन माय केर मोन शांत रहनि त बाल सुलभ जिज्ञासा कैल:
“माय, अहाँ फाटू हे धरती कियैक कहैत छियैक?”
माय कहली: “की कहु बाऊ, नारीक स्थिति एखनो सीता दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में. सीता के राम संगे विवाह भेलनि. लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह. राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक. दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि. जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह. मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि. जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि. सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि . सीता माला रामक गरदनि में डाले लगली. हठात सीता के सब सीतक हाथ अपना दिस खीच लेलनि. राम अक्चेकायल रहि गेलाह.
सखी सब कहलथिन : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि. अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी. मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि. अतए महिला सहचरी छथि. अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन. जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन. यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन. फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल. काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै.”
राम चिंता में आबि गेलाह . कहलथिन : “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी. मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी.”
सीताक सखी सब तखन कहलथिन: “ तखन सुनु. अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब!”
राम बजलाह : हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब.
फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि.
विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह. राम संगे बने बने घुमली. रावण हरण कै लंका ल गेलनि. अशोकक गाछ लग समय कटली. राम राम कहैत रहली. सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि. कहिओ कुनो शिकायत नहि. वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली.
जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन. कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्म शाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही. बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक?
अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि. अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह.
खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन. लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन. एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि. वनक लोक सब मदति केलकनि. इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी. मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक. हजमा के कहलथिन “तों भरत, के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि.”
जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि. राम के अपन वचन स्मरण भेलनि. कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब. तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता. सैह भेल.
मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन. सब हारि गेलाह. हनुमान बंदी भ गेलाह. अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह. राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह. कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू. सीता मना क देलथिन. राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि. मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली. अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत.”
सीता: “से कोना?”
राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि.”
सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?”
राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी.”
सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक ?”
ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ी करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी. अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी. आब हमर आत्मा कानि रहल अछि. अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय! “
धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दराक्का भ गेले. जाबेत राम रोक्थिन ताबेत सीता ओही धरती में बिलुप्त भ गेलीह.
ई बात कहि माए कनि जोर स सास लेलीह आ कहलनि “ बाऊ ताहि जखन हमरा सबके कोनो कष्ट होइएत अछि त अपना के सीता बुझैत छी आ अनायास मुह स निकलि जैत अछि : “फाटू हे धरती” .
ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि. अपमानित होइएत छथि. बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि. वेदना अनंत अछि.....”
ई बात कहैत माय केर नयन नोर स भरि गेलनि. ओहि क्षण त नेना रही आब बुझै छी जे माय के नोर कोना खसलनि!!!
थोरेकबे क्षण पहिने Kamini Kamini जी केर एक लघु कविता सीता पर पढल त लागल जेना हमर माय केर विचार स कतेक साम्य रखैत छथि! हुनकर लघु कविता नीचा में देल अछि:
हे ! जनक नन्दनी जनक दुलारी
जन -मन के अहाँ वासी ।
ई जानी लिय हे मातु जानकी
घर घर मे व्याप्त उदासी ।
आई एक रावण नहि एक सीता
पूरा समाज मयावी ।
घर -घर आई लंका बनल अछि
ककरा अपन व्यथा सुनावी ।
लेख साभार :- kailash kumar mishra
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