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च'ह छल हिय तोड़ि अहाँ बिहुँसीत छी


च'ह छल हिय तोड़ि अहाँ बिहुँसीत छी 


✍👤मैथिल प्रशान्त




ब'ह  नेहक  मचोड़ि अहाँ बिहुँसति छी 
च'ह छल हिय तोड़ि अहाँ बिहुँसति छी 

त'हमे औना रहल जिनगी अकाबोनमे 
एसगर  हमरा छोड़ि अहाँ बिहुँसति छी 

स'ह द' दानवकेँ उकनन्न केलहुँ साउधकेँ
बेर पर बस कल-जोड़ि अहाँ बिहुँसति छी 

ग'हमे देहक सन्हिया गेलैए कोन बलाए 
आँखिसँ निन्नक' चोरि अहाँ बिहुँसति छी 

न'ह कटबाक' लोक सभ बलिदानी भेलै  
नेतघट कते नेत गोरि अहाँ बिहुँसति छी 

✍👤 मैथिल प्रशान्त 
  दुर्गौली, बेनीपट्टी ।।

कवि- मैथिल प्रशान्त जी








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पोस्ट :- अशोक कुमार सहनी
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