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गै छौ तोरे सबटा दोख निराशी

गै छौ तोरे सबटा दोख निराशी




✍👤मनीष झा
जँ नहिं छलौ बापक अपमान सहन 
तऽ कियाक गेलें ओहेन डीह बसए लेल
जो करिहें मुहदब्बू बनि खबासी ।।
 गै छौ तोरे ..

भीख माँगि कऽ बाप अनलकौ टाका
ताहि पर पड़लौ दोसरक डाका 
बीच में तोरेह पड़लौ फाँसी ? 
गै छौ तोरे ..

झुठ्ठहि सुनै छि , जे नारी होइछ दुर्गा
तखन किया छौ अबला सन दशा
लऽ लितें हाथ खड्ग दू धारी ।।
 गै छौ तोरे ..

कि हेतौ गै ओहि घर जा कऽ तोरा 
बरसै छै जतय दहेजिया कोड़ा 
जो , भने रहिहें बनि क सभक दासी ।।
 गै छौ तोरे ..

मुँह कि तकै छें बाज ने जोड़ सँ 
नहिं त' भीजल रहतौ आँखि नोर सँ
मांगि ले अधिकार जेकर छें अधिकारी 
गै छीन ले अधिकार जेकर छें अधिकारी 
गै छौ तोरे सबटा दोख निराशी 

★★★★

✍👤Manish Jha

कवि -मनीष झा जी











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पोस्ट - अशोक कुमार सहनी 
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