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नै रहल सुबोध शरद

साहित्यजीवीक दू गोट जिनगी होइत छैक। महाप्रयाणक बाद ओ अपन कृति  मे जिबैत अछि। आइ Subodh Sharad  भाइ हमरा सभक सभटा रंग-रभस अपना संग लेने कतहुँ चलि गेलाह। आब नहि घुरता। जे ओ हमरा लोकनिके लेल छोड़ि  गेलाह अछि आब तही मे हुनका तकबैन। हुनक निश्चल व्यक्तित्व केँ फेर सँ बुझबाक प्रयत्न करबैन। हुनक सदिखन हँसैत आभा केँ महसूस करबैन। हुनक वैचारिक यात्रा मे सहभागी होएबाक उत्स केँ जियौने रहबैन। ओना तँ बहुत किछु छल कहबाक लेल मुदा से आब ककरा कहबै। एखन हुनकहि लिखल एहि कविताक संग दिवंगत आत्मक चिरशांति केर कामना करैत ओहि स्नेहिल भातृत्व कें मोन पाड़ैत छी :--- ✍👤विकाश वत्सनाभ 


स्व. सुबोध शरद

 ॥ हे प्रकृति ॥ 

कल्पना मात्र सं मन अथाह महासागर में,
विलोपित भ जाइ छै।
ज्ञानक प्रकाश जैना एक्करे रंग रूप में,
समायोजित भ जाय छै।
एक्कर गाथा केँ कै की वर्णन क सकै अछि,
ज कौई येहन प्रयास करलक त ई,
और विस्तृत भ जाइ छै।
और विस्तृत भ जाइ छै।
असीमित अद्भुत भव्य अहाँक छवि, हे प्रकृति।
चन्द्र में जोत अहीं सअ उदित रवि, हे प्रकृति।
जन्मदाता पालनकर्ता जीवनहर्ता केर समावेश।
अहीं छी ब्रह्मा अहीं छी विष्णु अहीं छी देव महेश।
अहीं विमल वसुन्धरा छी अहीं निल गगन।
जल जंगल जलाशय छी अहीं चंचल पवन।
पर्वत झड़ना गावै संग झूम रहल अन्नत।
ऋतु गावै अहींक महिमा करै बखान वसंत।
सार गीता केँ अहीं उद्धेश्य पुराण केँ।
वर्णन गुरु ग्रन्थ केँ अहीं अंश कुरान केँ।
मंजु मनोरम मधुरित प्रेम केर प्रसंग में।
पुष्प केर सुगंध में मिलिंद केर तरंग में।
हम प्राणी अज्ञान नाम मात्र केवल ज्ञान।
तुक्छ मुख स कौनाक संभव अहाँक सम्मान।
.....कौनाक संभव अहाँक सम्मान।।

स्व.सुबोध शरद 
डखराम

स्व. सुबोध शरद

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