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रसे रसे घोघसँ चन्ना बहार होइहे

रसे रसे घोघसँ चन्ना बहार होइहे

✍👤मैथिल प्रशान्त 

रसे रसे घोघसँ चन्ना बहार होइहे ।
हिया परती पर जानू अखार होइहे ।। 

गोर पायल बोलै जेना बैलक घंटी । 
चोखगर  नयनासँ चलबै है खंटी ।। 
छहोछित    छाती  नाचार  होइहे । 

गोर गोर देह पर है तैंत वला साड़ी । 
मानै है हमरा हमर बौआकेँ मतारी ।। 
नेह रस ठोरसँ बून्न बून्न टघार होइहे । 

एमकी अगहनमे आनि देबै झुमका । 
चलतै जे पेन्हक' लगेतै हमरा ठुनका ।।
सोचि  सोचि  मोन  कचनार  होइहे ।

~> ✍मैथिल प्रशान्त 
 दुर्गौली, बेनीपट्टी ।


कवि- मैथिल प्रशान्त जी ।













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