ओकरा ताकैत रही हम आ ओ ताकैत रहे हमरा
ओकरा ताकैत रही हम आ ओ ताकैत रहे हमरा
दिनेश रसिया
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ओकरा ताकैत रही हम आ ओ ताकैत रहे हमरा ।
छुछे अपसियात रही झामर भगेल देहक चमरा ।
एक त बर्ष दिनके पाबैन उपरसं फुलवारीक भीड
फुलमे भरल सुगन्ध अनेक लौटैत देखलौ भँवरा ।
सिखल सिखायल नै देखल देखायल रुप हुन्कर
पछवरिया हावा देखैते लागल खटगर अमरा ।
बाह्र बिध्हाक रहे ओकर मोनक परती
धुर कट्ठे रहे हमर मोनक कमरा ।
इनकलाब केलक रसिया ओकर प्रेममे
सिधासाधा रही आब लोग बुझे बमरा ।
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लेखक - दिनेश रसिया
लहान
२०७३–१२–२४
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| लेखक - दिनेश रसिया जी |
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पोस्ट -अशोक कुमार सहनी
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