जाहि ठाम राखलनि बिधना, जिनगीक सम्हारि गेलियै
----------मोनक उद्गार---------
जाहि ठाम राखलनि बिधना, जिनगीक सम्हारि गेलियै
✍👩खुशबू मिश्र
जाहि ठाम राखलनि बिधना, जिनगीक सम्हारि गेलियै।
माटिक बासन जेकाँ, कुम्हारक चाक गड़हाइत गेलियै।
नीक लागल जे कखनो किछु, अनसोहांत बुझैल किछु।
सभ रंगक हावा बसात, मोनक अाँगन में उतारि गेलियै।
पूर्णिमाक चानक इजोर, सुरुजक पसरल सिनेहक भोर।
अकाशक तरेगन जेकाँ, असगर चुपेचाप निहारि गेलियै।
प्रेम में डूबि परिवारक खुशी लेल चाशनी बनोबैत गेलियै।
दू कुलक लाज आँचरक खूट सऽ सकतगर बान्हि गेलियै।
नय जानि कियैक त्यागक मूरैत दैव जननी क ' बनौलैन।
शोणित शीतल राखि नौ मासक गर्भ कोखि उतारि गेलियै।
चहुँदिश फुलायल फूल बनि, देव पित्तरक धियान में लीन।
गाछक पल्ल्व बनि फुलही लोटाक कलश समायत गेलियै।
मिथिलाक नारी, जनक दुलारी छलीह जे मिथिलेश कुमारि।
राजमहल सऽ वन धरि हुनक जीवनक दर्शन बिचारि गेलियै।
✍️ खुशबू मिश्र
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| कबियात्री- खुशबू मिश्र जी |


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