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जीवन कखनो, एतेक दुःख सऽ भरल कियाक लगैत अछि

जीवन कखनो, एतेक दुःख सऽ भरल कियाक लगैत अछि







लेखक- श्री अखिलेश झा 


जीवन कखनो, एतेक दुःख सऽ भरल कियाक लगैत अछि
दुःख तऽ सबके छै, अपन बेसी कियाक लगैत अछि?

एतह चान, नदी, फुलबारी, हंसी, ख़ुशी सब अछि
हमरा सब रहितो  श्मसान कियाक लगैत अछि?

प्रेम आ सम्बन्धमे ठेस लागते रहेत अछि
मुदा टीस एतैक दिन कियाक रहैत अछि?

गम - गम करैत फुल आ लोक, सब जगह अछि
हमरा बाड़ी- झाड़ी उजाड कियाक लागैत अछि?

अहि दुनिया के देख लेलहुँ कि - कि अछि
आब ओ दुनिया देखि, कि -कि होयत अछि?

जे जान- प्राण देय लेल तैयार रहैत अछि
वैह उलहन, उपराग कियाक देत अछि?

कहल जायत छै छाह  हरदम संग रहैत अछि
ओकरो कहि देबे,कियो ककरो संग नहि मरैत अछि |
कवि - श्री अखिलेश झा जी













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पोस्ट - अशोक कुमार सहनी
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