लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।
अप्पन राज !
लेखक - चंद्रमणि झा
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हे रे भइया ! हे गे दइया ! झाड़ू अपन सम्हार,
भगा विदेशिया के मिथिला सँ झोल-झाल के झाड़,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िके लs ले अप्पन राज।।
हमरा घर मे दोसर बैसल सिर पर धएने ताज,
लोकतंत्र मे सकल बराबर तखन कथीके लाज,
अपना हक ले नहि लड़बेँ तs कहतौ सब डरपोक,
अपना सँ अपनहि छेँ हारल कते मनेबेँ शोक,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िकs ल' ले अप्पन राज।।
तोहर खेत मे सीता उपजौ तोरा घर मे काली,
लव-कुश महावीर छौ भागिन के बढ़िकs बलशाली,
याज्ञवल्क्य शंकर गार्गी मैत्रेयी विद्याखान,
गौतम उदयन वाचस्पति मण्डन सँ छौ पहिचान,
आब कते दिन चुप्प रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले’ मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।।
जकर पहरुआ छैक हिमालय मा गंगा निशिवासर,
कोशी-कमला अपर तिलजुगा सर सरिता चर-चाँचर,
त्रिपुरारी उगना सन सेवक गौरीके ई नइहर,
सिंहवाहिनी केर कृपा छौ कालो सँ नइ कर डर,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले’ मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।।
महाभारतक कालक मिथिला छल जगतक सिरमौर,
अपन भुजा मे छौ असीम बल तुलित भुवन नहि और,
तजि प्रमाद हूँकार भरै तोँ मिथिला राज बनाले,
जाग ,चंद्रमणि’ जन्मभूमिके दूधक कर्ज सधा ले,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।।
लेखक - चंद्रमणि झा
💐💐💐💐💐💐💐💐👍💐💐💐💐
पोस्ट - अशोक कुमार सहनी
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लेखक - चंद्रमणि झा
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हे रे भइया ! हे गे दइया ! झाड़ू अपन सम्हार,
भगा विदेशिया के मिथिला सँ झोल-झाल के झाड़,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िके लs ले अप्पन राज।।
हमरा घर मे दोसर बैसल सिर पर धएने ताज,
लोकतंत्र मे सकल बराबर तखन कथीके लाज,
अपना हक ले नहि लड़बेँ तs कहतौ सब डरपोक,
अपना सँ अपनहि छेँ हारल कते मनेबेँ शोक,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िकs ल' ले अप्पन राज।।
तोहर खेत मे सीता उपजौ तोरा घर मे काली,
लव-कुश महावीर छौ भागिन के बढ़िकs बलशाली,
याज्ञवल्क्य शंकर गार्गी मैत्रेयी विद्याखान,
गौतम उदयन वाचस्पति मण्डन सँ छौ पहिचान,
आब कते दिन चुप्प रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले’ मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।।
जकर पहरुआ छैक हिमालय मा गंगा निशिवासर,
कोशी-कमला अपर तिलजुगा सर सरिता चर-चाँचर,
त्रिपुरारी उगना सन सेवक गौरीके ई नइहर,
सिंहवाहिनी केर कृपा छौ कालो सँ नइ कर डर,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले’ मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।।
महाभारतक कालक मिथिला छल जगतक सिरमौर,
अपन भुजा मे छौ असीम बल तुलित भुवन नहि और,
तजि प्रमाद हूँकार भरै तोँ मिथिला राज बनाले,
जाग ,चंद्रमणि’ जन्मभूमिके दूधक कर्ज सधा ले,
आब कते दिन चुप रहबेँ तोँ मुँह सँ किछु तs बाज
लड़िकs लs ले मिथिला राज लड़िकs लs ले अप्पन राज।।
लेखक - चंद्रमणि झा
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| लेखक - चंद्रमणि झा |
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पोस्ट - अशोक कुमार सहनी
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