जगत जननी सीता
धरती पुत्री सीता
जनक नन्दनी जानकी
मिथिलाक गौरव मैथिलीक
जन्मदिनक हार्दिक शुभकामना !!
जगत जननी सीता
अशोक कुमार सहनी, दोहा क़तार, अपन मिथिला / जगत जननी सीता कए मैथिली सेहो कहल जाएत अछि। सीता क जन्म वर्तमान जनकपुर स 26 मील दक्षिण-पश्चिम पुरौना क उत्तर तट पर यज्ञ भूमि मे भेल अछि । एहिलेल एकर नाम देव-यजनसम्भवा सेहो अछि। जाहि जगह हिनकर जन्म भेल ओ जगह आय सीतामढ़ी क नाम स प्रसिद्ध अछि । सीता वैशाख शुक्ल पक्ष क नवमी तिथि क जनमलीह । एक त लक्ष्मीरूपा जानकी अपने बहुमुखी प्रतिभा क धनी छलीह, ऊपर स परम विदुषी सुनयना क शिक्षा सोना पे सोहागा कए देलक । सीता महाविदुषी भ गेलीह । सीता क वेद मे बताओल गेल दांपत्य धर्म क सभटा गप कुशलता स बुझा गेल । सीता राजनीति शास्त्र क ज्ञाता छलीह, सीता कए सभटा वेद क ज्ञान छल, ओ तंत्र माया आ योग माया मे सेहो निपुण छलीह । हुनकर योगमाया क ज्ञान हुनकर पिता कए तखन बुझलाह जखन सिरध्वरज देखलथि कि जानकी अपन आंगुर स शिव कए विशाल धनुष कए एक जगह से दोसर जगह कए रहल छलीह । ओहि काल जनक तय केलथि कि जे पुरुष एहि धनुष कए उठाकए एहिपर प्रत्यंचा चढ़ा देत, हुनके स वो अपन बेटी क विवाह करताह ।
पत्नी आ पति भारतीय संस्कृति मे एक-दोसरा क पूरक होएत अछि। आदर्श पत्नी क चरित्र हमरा सभकए जगदम्बा जानकी क चरित्र मे तखन दृष्टि-गोचर होएत अछि, जखन श्रीराम द्वारा वन मे साथ नै चलबाक बात कहला पर अपन अंतिम निर्णय एहि शब्द मे कहि देने छलीह –
प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ।
जिय बिन देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरूष बिनु नारी ॥ (अयोध्या कांड )
एहि प्रकार सीता क तंत्रज्ञान क प्रमाण हुनकर अशोक वाटिका मे रावण क संग संवाद काल भेटेत अछि । एकटा छोट सन तृण कए तंत्र क माध्यमम से ओ अस्त्र कए रूप दए देलथि आओर रावण हुनकर प्रतापे क कारण सीता क नजदीक नहि आबि सकलाह । सीता अपन तांत्रिक ज्ञान स खाली एतबे कहलथि –
तृण धरि ओट कहति वैदेही, सुमिरि अवधपति परम सनेही ।
सुनु दस मुख खद्योत प्रकासा, कबहुँ कि नलिनी करइ विकासा । (सुदंर कांड )
एहि प्रकार सीता क खोज में जखन हनुमान श्रीलंका पहुंचल त सीता हुनका चिन्हबा स मना कए देलीह । राम क एहि दूत की सभटा गप कए सीता मायावी रावण की चाल बुझी रहल छलीह । अंतत: हनुमान मैथिली भाषा मे सीता स वार्तालाप केनाय शुरु केलाह आओर सीता कए विश्वास भए गेल कि हनुमान जे कहि रहल छथि ओ सत्ते कहि रहे छथि । लंका मे सीता क पहचान कए क हुनकर व्यक्तित्व क प्रशंसा करैत हनुमान जी ने कहलाह-
“दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनावसीदति ।
यदि नामः समुद्रान्तां मेदिनीं परिवर्तयेत् अस्थाः कृते जगच्चापि युक्त मित्येव मे मतिः।। (सुदंर कांड )
अर्थात् ऐहन सीता क बिना जीवित रहिकए राम सत्ते बड़ दुष्कर काज केने छथि । हिनका लेल जों राम समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी कए पलटि दए, तखनो हमर समझ मे उचिते होएत, त्रैलौक्य क राज्य सीता क एकटा कला क बराबर सेहो नहि अछि ।
रावण वध क बाद जखन सीता कए स्वीकार करबाक बात आयल, त राम हुनका स अग्नि परीक्षा देबाक लेल कहलाह । सीता लक्ष्मण, विभिषण, हनुमान संग लाखों वानर सेना कए गवाह रखैत अग्नि मे अपना कए समर्पित कए देलीह । ई सीताक न्याय शास्त्र कए एक चुनौती छल । भगवान अग्नि अपने प्रकट भए कए सीता कए पवित्र आओर महान पतिव्रता नारी क रूप मे परिभाषित केलाह । सीता अयोध्या घुरिकए महारानी क रूप मे सिंहासन पर विराजमान भेलीह । एक राति जखन राम वेष बदलि कए नगर मे भ्रमण कए रहल छलाह त एकटा धोबी अपन पत्नी पर चारित्रहनन क आरोप लगाबैत सुनेलक कि वो राम जेंका अनका घर मे राति गुजारल कनिया कए कहियो स्वीकार नहि करत । ई सुनि कए राम फैसला लेलथि कि ओ सीताक त्याग करतथि । लक्ष्मण कए आदेश देल गेल कि सीता कए अयोध्या स बाहर मिथिलाक सीमा पर छोड़ि आबय। लक्ष्मण एहि क ई कहैत विरोध केलथि कि सीता पवित्र छथि आओर विभिषण, हनुमान संगे लाखों वानर सेना एकर गवाह अछि । राम लक्ष्मण से कहलथि, हे लक्ष्मण हम जनैत छी कि सीता पवित्र छथि, मुदा जों हमर प्रजा क मोन मे एहन कोनो शंका अछि, त हमरा एकटा राजा क रूप मे सीताक तत्काल त्याग केनाय जरूरी अछि। सीता कए जखन लक्ष्मण राम क एहि संदेश सुनेलथि त ओ मुर्छित भए कए खसि पड़लीह। होश मे ऐबा पर ओ जल समाधि लेबाक विचार केलीह । सीता क नदी दिस जाएत देखि महर्षि बाल्मिकी हुनका रोकलथि आओर वैदेही स कहलथि, हे देवी सीता, हम जनैत छी कि राम अहाँक संगे न्याय नहि केने छथि, मुदा अहाँ एहि कलंक संगे जल समाधि लेब त दुनिया अहाँक एहि रूप मे याद करत। न्याक क लेल अहाँक जिंदा रहय पड़त । राम कए अपन गलती पर पश्चाताप कए अहाँक मौका देनाए चाहि । अहाँक गर्भ मे पलि रहल संतान अहाँक एहि कलंक से मुक्त कराओत । सीता हुनकरे आश्रम मे लव-कुश कए जन्म देलीह । बाल्मिकी सीता क दुनू पुत्र कए वेदज्ञान क संगे युद्ध कला मे सेहो पारंगत कए देलक । बचपने स दुनू बच्चाक मोन मे रामक प्रति एकटा छवि स्थापित केलथि, जे रामायण क रूप मे हुनका सुनाओल और पढ़ाओल गेल । अयोध्यापति राम जखन अश्वमेघ यज्ञ क घोड़ा खोलने छलाह तो मिथिला क सीमा पर यज्ञ क घोड़ा देखि लव-कुश ओकरा पकड़ि कए रामक साम्राज्य कए चुनौती देलथि । एक-एक कए राम क सेना हारैत गेलाह । हनुमान बंधक बना लेल गेलाह आओर लक्ष्मण बेहोश करि देल गेलाह । राम कए जखन एहि गप क सूचना भेटल त ओ गोस्सा स लाल भए गेलाह आओर मिथिला दिस प्रस्थान केलथि। पिता-पुत्र क बीच एहि युद्ध कए देखि सीता बीच मे ठा़ड़ भए गेलीह । राम स्तब्ध भ कए सीता कए देखय लगलाह । बाल्मिकी कहलथि, हे राम जे किनको से नहि हारत, ओ अपन पुत्र से हारि जाएत । लव-कुश अहाँक पुत्र छथि । राम दुनू पुत्र कए स्वीकार करैत सीता स अयोध्या चलबाक गुहार केलथि । राम सीता स कहलथि, ‘हे सीते, पूरा अयोध्या अपन भूल पर कानि रहल अछि, अहाँ अयोध्या लौटिकए हुनका क्षमादान दए दियो । सीता हाथ जोड़िकए पहिने बाल्मिकी कए प्रणाम कलथि , फेर मां धरा स प्रार्थना करैत छलीह कि आब ओ कलंक मुक्त अछि, हुनकर पुत्र पिता लग सुरक्षित अछि, आब हुनकर खाली एतबे टा इच्छा अछि कि जाहि प्रकार ओ एहि जगत मे जन्म लेने छलीह ओहि प्रकार ओ ई जगत से विदा हेतीह । सीताक एहि प्रार्थना क बाद भीषण भूकंप भेल आओर जगह-जगह दारार फाटने लागल । लोग जखन तक सम्हरतीह सीता धरती मे समा चुकल छलीह । सीता जेहन जीवन कोनो मैथिली क नहि हो एहि कामना क संग बाल्मिकी सेहो समाधि लए लेलथि । सीताक धरती मे बिला जेनाय एक तरह क राजनीतिज्ञ विद्रोह छल, ओहि अपमान क प्रति जे पुरुष-सत्ता स हुनका भेटल छल । सीता, एकटा प्रतीक छथि-विद्रोह क, एकटा सतत संघर्ष क। सीता, वैदेही क रूप मे आइयो मिथिला मे भेटि जेतीह । साहित्य मे सीता क आदर्श से प्रभावित लक्ष्मण कहैत छथि- “नारी के जिस भव्य भाव का, स्वाभिमान भाषी हूँ मैं । उसे नरों में भी पाने का, उत्सुक अभिलाषी हूँ मैं । नारी पात्र मे सीते टा सबसे बेसी, विनयशीला, लज्जाशीला, संयमशीला, सहिष्णु और पातिव्रत क दीप्ति स दैदीप्यमान नारी छलीह । समूचा रामकाव्य हुनके तप, त्याग आ बलिदान क मंगल कुंकुम से जगमगा उठल अछि ।
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जनक नन्दनी जानकी
मिथिलाक गौरव मैथिलीक
जन्मदिनक हार्दिक शुभकामना !!
जगत जननी सीता
अशोक कुमार सहनी, दोहा क़तार, अपन मिथिला / जगत जननी सीता कए मैथिली सेहो कहल जाएत अछि। सीता क जन्म वर्तमान जनकपुर स 26 मील दक्षिण-पश्चिम पुरौना क उत्तर तट पर यज्ञ भूमि मे भेल अछि । एहिलेल एकर नाम देव-यजनसम्भवा सेहो अछि। जाहि जगह हिनकर जन्म भेल ओ जगह आय सीतामढ़ी क नाम स प्रसिद्ध अछि । सीता वैशाख शुक्ल पक्ष क नवमी तिथि क जनमलीह । एक त लक्ष्मीरूपा जानकी अपने बहुमुखी प्रतिभा क धनी छलीह, ऊपर स परम विदुषी सुनयना क शिक्षा सोना पे सोहागा कए देलक । सीता महाविदुषी भ गेलीह । सीता क वेद मे बताओल गेल दांपत्य धर्म क सभटा गप कुशलता स बुझा गेल । सीता राजनीति शास्त्र क ज्ञाता छलीह, सीता कए सभटा वेद क ज्ञान छल, ओ तंत्र माया आ योग माया मे सेहो निपुण छलीह । हुनकर योगमाया क ज्ञान हुनकर पिता कए तखन बुझलाह जखन सिरध्वरज देखलथि कि जानकी अपन आंगुर स शिव कए विशाल धनुष कए एक जगह से दोसर जगह कए रहल छलीह । ओहि काल जनक तय केलथि कि जे पुरुष एहि धनुष कए उठाकए एहिपर प्रत्यंचा चढ़ा देत, हुनके स वो अपन बेटी क विवाह करताह ।
पत्नी आ पति भारतीय संस्कृति मे एक-दोसरा क पूरक होएत अछि। आदर्श पत्नी क चरित्र हमरा सभकए जगदम्बा जानकी क चरित्र मे तखन दृष्टि-गोचर होएत अछि, जखन श्रीराम द्वारा वन मे साथ नै चलबाक बात कहला पर अपन अंतिम निर्णय एहि शब्द मे कहि देने छलीह –
प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ।
जिय बिन देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरूष बिनु नारी ॥ (अयोध्या कांड )
एहि प्रकार सीता क तंत्रज्ञान क प्रमाण हुनकर अशोक वाटिका मे रावण क संग संवाद काल भेटेत अछि । एकटा छोट सन तृण कए तंत्र क माध्यमम से ओ अस्त्र कए रूप दए देलथि आओर रावण हुनकर प्रतापे क कारण सीता क नजदीक नहि आबि सकलाह । सीता अपन तांत्रिक ज्ञान स खाली एतबे कहलथि –
तृण धरि ओट कहति वैदेही, सुमिरि अवधपति परम सनेही ।
सुनु दस मुख खद्योत प्रकासा, कबहुँ कि नलिनी करइ विकासा । (सुदंर कांड )
एहि प्रकार सीता क खोज में जखन हनुमान श्रीलंका पहुंचल त सीता हुनका चिन्हबा स मना कए देलीह । राम क एहि दूत की सभटा गप कए सीता मायावी रावण की चाल बुझी रहल छलीह । अंतत: हनुमान मैथिली भाषा मे सीता स वार्तालाप केनाय शुरु केलाह आओर सीता कए विश्वास भए गेल कि हनुमान जे कहि रहल छथि ओ सत्ते कहि रहे छथि । लंका मे सीता क पहचान कए क हुनकर व्यक्तित्व क प्रशंसा करैत हनुमान जी ने कहलाह-
“दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनावसीदति ।
यदि नामः समुद्रान्तां मेदिनीं परिवर्तयेत् अस्थाः कृते जगच्चापि युक्त मित्येव मे मतिः।। (सुदंर कांड )
अर्थात् ऐहन सीता क बिना जीवित रहिकए राम सत्ते बड़ दुष्कर काज केने छथि । हिनका लेल जों राम समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी कए पलटि दए, तखनो हमर समझ मे उचिते होएत, त्रैलौक्य क राज्य सीता क एकटा कला क बराबर सेहो नहि अछि ।
रावण वध क बाद जखन सीता कए स्वीकार करबाक बात आयल, त राम हुनका स अग्नि परीक्षा देबाक लेल कहलाह । सीता लक्ष्मण, विभिषण, हनुमान संग लाखों वानर सेना कए गवाह रखैत अग्नि मे अपना कए समर्पित कए देलीह । ई सीताक न्याय शास्त्र कए एक चुनौती छल । भगवान अग्नि अपने प्रकट भए कए सीता कए पवित्र आओर महान पतिव्रता नारी क रूप मे परिभाषित केलाह । सीता अयोध्या घुरिकए महारानी क रूप मे सिंहासन पर विराजमान भेलीह । एक राति जखन राम वेष बदलि कए नगर मे भ्रमण कए रहल छलाह त एकटा धोबी अपन पत्नी पर चारित्रहनन क आरोप लगाबैत सुनेलक कि वो राम जेंका अनका घर मे राति गुजारल कनिया कए कहियो स्वीकार नहि करत । ई सुनि कए राम फैसला लेलथि कि ओ सीताक त्याग करतथि । लक्ष्मण कए आदेश देल गेल कि सीता कए अयोध्या स बाहर मिथिलाक सीमा पर छोड़ि आबय। लक्ष्मण एहि क ई कहैत विरोध केलथि कि सीता पवित्र छथि आओर विभिषण, हनुमान संगे लाखों वानर सेना एकर गवाह अछि । राम लक्ष्मण से कहलथि, हे लक्ष्मण हम जनैत छी कि सीता पवित्र छथि, मुदा जों हमर प्रजा क मोन मे एहन कोनो शंका अछि, त हमरा एकटा राजा क रूप मे सीताक तत्काल त्याग केनाय जरूरी अछि। सीता कए जखन लक्ष्मण राम क एहि संदेश सुनेलथि त ओ मुर्छित भए कए खसि पड़लीह। होश मे ऐबा पर ओ जल समाधि लेबाक विचार केलीह । सीता क नदी दिस जाएत देखि महर्षि बाल्मिकी हुनका रोकलथि आओर वैदेही स कहलथि, हे देवी सीता, हम जनैत छी कि राम अहाँक संगे न्याय नहि केने छथि, मुदा अहाँ एहि कलंक संगे जल समाधि लेब त दुनिया अहाँक एहि रूप मे याद करत। न्याक क लेल अहाँक जिंदा रहय पड़त । राम कए अपन गलती पर पश्चाताप कए अहाँक मौका देनाए चाहि । अहाँक गर्भ मे पलि रहल संतान अहाँक एहि कलंक से मुक्त कराओत । सीता हुनकरे आश्रम मे लव-कुश कए जन्म देलीह । बाल्मिकी सीता क दुनू पुत्र कए वेदज्ञान क संगे युद्ध कला मे सेहो पारंगत कए देलक । बचपने स दुनू बच्चाक मोन मे रामक प्रति एकटा छवि स्थापित केलथि, जे रामायण क रूप मे हुनका सुनाओल और पढ़ाओल गेल । अयोध्यापति राम जखन अश्वमेघ यज्ञ क घोड़ा खोलने छलाह तो मिथिला क सीमा पर यज्ञ क घोड़ा देखि लव-कुश ओकरा पकड़ि कए रामक साम्राज्य कए चुनौती देलथि । एक-एक कए राम क सेना हारैत गेलाह । हनुमान बंधक बना लेल गेलाह आओर लक्ष्मण बेहोश करि देल गेलाह । राम कए जखन एहि गप क सूचना भेटल त ओ गोस्सा स लाल भए गेलाह आओर मिथिला दिस प्रस्थान केलथि। पिता-पुत्र क बीच एहि युद्ध कए देखि सीता बीच मे ठा़ड़ भए गेलीह । राम स्तब्ध भ कए सीता कए देखय लगलाह । बाल्मिकी कहलथि, हे राम जे किनको से नहि हारत, ओ अपन पुत्र से हारि जाएत । लव-कुश अहाँक पुत्र छथि । राम दुनू पुत्र कए स्वीकार करैत सीता स अयोध्या चलबाक गुहार केलथि । राम सीता स कहलथि, ‘हे सीते, पूरा अयोध्या अपन भूल पर कानि रहल अछि, अहाँ अयोध्या लौटिकए हुनका क्षमादान दए दियो । सीता हाथ जोड़िकए पहिने बाल्मिकी कए प्रणाम कलथि , फेर मां धरा स प्रार्थना करैत छलीह कि आब ओ कलंक मुक्त अछि, हुनकर पुत्र पिता लग सुरक्षित अछि, आब हुनकर खाली एतबे टा इच्छा अछि कि जाहि प्रकार ओ एहि जगत मे जन्म लेने छलीह ओहि प्रकार ओ ई जगत से विदा हेतीह । सीताक एहि प्रार्थना क बाद भीषण भूकंप भेल आओर जगह-जगह दारार फाटने लागल । लोग जखन तक सम्हरतीह सीता धरती मे समा चुकल छलीह । सीता जेहन जीवन कोनो मैथिली क नहि हो एहि कामना क संग बाल्मिकी सेहो समाधि लए लेलथि । सीताक धरती मे बिला जेनाय एक तरह क राजनीतिज्ञ विद्रोह छल, ओहि अपमान क प्रति जे पुरुष-सत्ता स हुनका भेटल छल । सीता, एकटा प्रतीक छथि-विद्रोह क, एकटा सतत संघर्ष क। सीता, वैदेही क रूप मे आइयो मिथिला मे भेटि जेतीह । साहित्य मे सीता क आदर्श से प्रभावित लक्ष्मण कहैत छथि- “नारी के जिस भव्य भाव का, स्वाभिमान भाषी हूँ मैं । उसे नरों में भी पाने का, उत्सुक अभिलाषी हूँ मैं । नारी पात्र मे सीते टा सबसे बेसी, विनयशीला, लज्जाशीला, संयमशीला, सहिष्णु और पातिव्रत क दीप्ति स दैदीप्यमान नारी छलीह । समूचा रामकाव्य हुनके तप, त्याग आ बलिदान क मंगल कुंकुम से जगमगा उठल अछि ।
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