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बेईमान बिदेसिया


😢बेईमान बिदेसिया😢



✍👤डॉ. कैलाश कुमार मिश्र 



सुनयना जखन 13 बरखक भेलि त हुनकर विवाह मणिशंकर सङ्ग भ गेलनि। सुनयना नामे गुणे सुन्नरि छलि। केराक पोर सन सोझ शरीर। पतरे कांति, दूधिया गोराई, नमहर-नमहर ठेहुन तक लटकैत केस, रसगर ठोर, नमहर-नमहर चमकैत आँखि जाहि में सब दिन हुनक माय काजर लगा दैत छलथिन। सुनयना केर किछु बहिनपा सब कायथ छलथिन। ओ सब सुनयना के रंग रभस में कहथिन: "बुझलौं सुनयना, अहाँ के विवाह भ रहल अछि । किछु दिन बाद बच्चो भ जैत। आ जखन हमर सबहक विवाह 25 वर्ष में हैत एवं ओकर चारि-पांच बरख में बच्चा हैत तावेत धरि अहाँ नानी अथवा दादी बनबाक अवस्था मे आबि जैब।" 

नेना सुनयना नहि बुझि पबैत छलि अंततः केथीनिया छौड़ी सब ओना कियैक कहैत छलनि! मुदा ई जरूर बझल छलनि जे 13 पुरैत विवाहक बंधन में बन्हा जेती। सोइतगामक व्यवहार सैह छलैक। सैह भेवो केलनि। सुनयना सँ हुनकर पति सुभद्र 8 बरखक पैघ छलथिन। मतलब ई भेल जे 13 के सुनयना आ 21 के सुभद्र।

 सुभद्र पटना कॉलेज में पढ़ैत छला। जेहने सुनयना सुन्नरि तेहने सुन्नर सुभद्र। दुनू उपरा-उपरी। ककरो सँ कियोक कम नहि। अंतर केवल उमेरि के। सुभद्र खेलल लोक आ सुनयना निश्छल अल्हड़ बाला। सुनयना के की बझल जे केलि ककरा कहैत छैक। पति-पत्नी असगर घर मे भीतर सँ केबाड़ लगा कियैक सुतैत छैक? फेर असगर में सगरि राति की की होईत छैक? 
सुनयना लेल त विवाहक अर्थ नव वस्त्र धारण करब भेल, पतिक रूप में पुरुखक संगति, सासुरक रूप में दोसर घर; नाना तरहक बिध बेभार , गीत-नाद आर किछु नहि! सही अर्थ में जौं विवाह अतेक सहज चीज़ रहितैक त सभक जीवन बैकुंठक जीवन भ सकैत छ्ल। एहेन सुख कल्पनालोक में संभव मुदा यथार्थ में असंभव छैक।

खैर विवाह भेलाक बाद सुनयना सासुर एलि। कुनो तरहक सासुर में दिक्कत नहि। खेत, पथार, सुन्नर घर, पैसा, गहना सब किछु पर्याप्त। ऊपर सँ अत्यधिक सिनेह करय बला सासु-ससुर। दू ननदि, आ दुनू के विवाह भेल। करीव 25 दिन धरि मणिशंकर गामे रहलनि। सुनयना के बहुत बात आ क्रिया सिखेबाक यत्न केलनि। किछु क्रिया में सफल भेला, किछु में आंशिक सफल आ किछु में पूर्ण रूप सँ असफल। सुनयना सेहो शुरू में बड़ परेशान भेली। भेलनि, "छी! ई केहेन बात आ केहेन काज छैक? अगर विवाहक उद्देश्य ओ छैक त फेर एहि प्रथाक अंत भ जेबाक चाही! मणिशंकर नहु-नहु युवा अवस्था के सब गुण में सुनयना के निपुण करय लगलनि। कखनो दर्दक अधिकता, कखनो परम्परा के मजबूरी, कखनो झल्लाहट, कखनो, खौंझ, कखनो प्रेम आ कखनो मनुहारक सँग सुनयना नहु-नहु सुभद्रक प्रेम में रम' लगली। सब बात बुझए लगली। सब किछु के आदान-प्रदान होब लगलनि। सुभद्र सेहो सुनयना के प्रेम में भेड़ भेने रहलनि। समय कोना समाप्त भ गेलनि से पते ने चललनि। जहिया पटना वापस जेबाक छलनि तकर 3 दिन पहिने सँ सुनयना आ सुभद्र के जेना उचाट लागि गेल होनि। अंततः दुखी मन सँ तेसर दिन भोरे सुभद्र पटना लेल बिदा भ गेला।


पटना जाइते देरी सुभद्र सुनयना के एक अति पैघ चिट्ठी लिखलथिन। प्रेम आ मनुहार सँ भरल; मान आ मानिनि के दुलार सँ भरल; नेह आ सिनेह सँ भरल पत्र। के कहैत अछि जे 13-14 बरखक कन्या प्रेमक भाव नहि बुझैत अछि! अतै त सब किछु परिलक्षित भ रहल छल।  जतेक सिनेह सँ सुभद्र चिट्ठी लिखैथ ततबे सिनेह सँ सुनयना उत्तर देथिन। हाँ शिक्षा केर कमी के कारणे शब्द आ वाक्य संयोजना में सुनयना कनि कम भ जाइत छलि मुदा अगर ककरो मन मे हृदयक भाषा पढ़बाक क्षमता होइक त ओ सहजहि अनुमान लगा सकैत छल जे भावक गहनता में सुनयना सेहो कम थोड़े ने छलि।

 सब मास में सुभद्र के पटना में सुनयना के अभाव में जेना उचाट होमय लगनि। गाम जेना बिझौ करबनि। कुनो ने कुनो बहाना बना पांचों दिन लेल गाम अवश्य आबि जाइत छला। हुनका गाम अबितहि सुनयना के मोन हरियर भ जानि। एहेन कर्म 3 बरख धरि चलैत रहलनि। सुनयना एहि बीच प्रथम संतान अरुणाभ के जन्म देलीह। सुभद्र के पिता अपन पोता के देखि विभोर भ गेला। भेलनि जेना जीवनक सर्वस्व भेट गेल होनि!

आब सुनयना 17 बरख के भ गेल छलीह।

अरुणाभ देखबा में विलक्षण। सुनयना के पुत्र सुन्नर छलनि से स्वाभाविक। जकर जकर माता पिता दुनू सुन्नर होइक ओकर संतान त सहजहि सुन्नर हेतैक। सुभद्र सेहो अपन पुत्र अरुणाभ के देखि गदगद छलनि। कतेक बेर असगर में कोरा उठबथि। सबहक समक्ष मर्यादा के रक्षा करैत कनि साकांक्ष रहैत छला।

अहि बीच सुभद्र बी ए अर्थशास्त्र प्रतिष्ठा सँग प्रथम श्रेणी सँ उतीर्ण भेलनि। परीक्षा पास होइते देरी उत्तर प्रदेश सरकार में सीनियर अकाउंटेंट केर सरकारी नौकरी भेट गेलनि।  सुभद्र लखनऊ चलि गेला। माता-पिता एसगर तांहि सुनयना के कोना ल जैतथि? निर्णय भेल जे सुनयना गाम पर सासु-ससुर लग रहती । सैह भेल। शुरू में सुनयना बिनु सुभद्र के मोने ने लगनि। दिन काटब लखनऊ सन शहर में मुश्किल। किछु भ जानि मास में पटने जकाँ एकबेर अवश्य अबैत छलनि।

लखनऊ गेलाक तीन वर्षक भीतर 2 बेटी भेलनि सुनयना के । समय बितैत गेल। एकाएक सुभद्र गाम एनाई कम क देलनि। एक मासक बदला 3-4 मास पर आबथि। बेचारी सुनयना लाचार भ बिना पति के 3-4 मासक पहाड़ सन समय कटैत छलि। सुभद्र सुनयना सँ ई कहैत छलथिन जे हुनका लग ततेक काज छनि जे छुट्टी नहि भेटैत छनि। ताहिं अतेक काल बाद गाम अबैत छथि। पतिभक्ति के रंग में गहे-गहे रंगल सुनयना सुभद्र के बात के सत्य मानि लैत छलि।

2 बरखक बाद सुभद्र साल में एक बेर आबथि। सुनयना फेरो हुनकर तर्क के मनने जाथि। ओना आब अरुणाभ सेहो पैघ भ रहल छला। पितामह सब बातक धेआन राखैत छलथिन मुदा पिताक स्थान आन कोना ल लेतैक? अरुणाभ के आ सुनयना के सुभद्र केर कमी केर अनुभूति आब नित-प्रति होमय लगलनि। मुदा अहि बातक अनुभूति कहि नहि कियैक सुभद्र के ओतेक जेना नहि होनि!

समय बितैत गेल। आब सुभद्र ड़ेढ-2 बरख में एक बेर सेहो 10 दिन लेल आबय लगलनि। एतेक दिन कोइली जकाँ गीत गाबि-गाबि सुनयना समय बितबथि। अरुणाभ पैघ होइत रहलनि। अरुणाभ मैट्रिक प्रथम श्रेणी सँ उतीर्ण भेला आ सी एम साइंस कॉलेज में आई एस सी में नामांकन लेलनि। अरुणाभ के पितामह के अतेक सम्पति छलनि जे हुनका अपन पुत्र सुभद्र सँ कुनो वस्तुक कमी नहीं छलनि।

समय बितैत गेलैक आ अरुणाभक दुनू बहिन - सौदामिनी आ चित्रगन्धा केर विवाह योग्य वर सँ शुभ-शुभ क सम्पन्न भ गेलनि।
दुनू बेटीक  विवाह में सुभद्र धर्मदोख छोड़बैत उपस्थित रहलनि। एकर पैघ लाभ ई भेलनि जे कियोक ई शंका नहि केलकनि जे ओ एतैक दिनक बाद कथिलेल गाम अबैत छथि? ऊपर सँ माता-पिता अलग प्रसन्न जे विवाहक समय मे उपस्थिति त देखेलनि। 

दुनू बेटी के विवाह के बाद सुभद्र 2-3 साल में एक बेर गाम आबय लगलनि। सुनयना के प्रति हुनकर आकर्षण जेना कम भेल जाइन! सुनयना सेहो आब अपना-आपके घरक काज में व्यस्त केने रहलि। मुदा सुभद्र के कमी कोना कम भ सकैत छलनि?

अरुणाभ बी एस सी प्रथम श्रेणी सँ पास केलनि। पितामह आ सुनयना बड्ड प्रसन्न भेलथिन। अनेक घटक सब विवाह लेल आबय लगलथिन। अरुणाभ साफे मना क देलथिन: "जाबेत धरि ढंगक नौकरी नहि लागि जैत ताबेत धरि विवाहक कुनो चर्च नहि होबक चाही।" कनि न-नुकुर केलक बाद पितामह मानि गेलथिन। आब पटना रहि अरुणाभ सिविल सर्विस केर सेवा के तैयारी करय लगलनि। प्रथम प्रयास में किछु ने भेलनि।

 सुभद्र गामक प्रति दिन-प्रतिदिन उदासे भेल गेला। कहि नहि कथिलेल? सुनयना एखनो एहि आशा में चलु, 3 बरख में एक बेर त अबैत छथि ने। अपना आप के बहलबैत रहलनि। लोक सब लेकिन आब अपना आप मे रंग-विरंगक बात बाजय लागल। एकाएक अरुणाभ के लगलनि जेना परिवारक सङ्ग आ विशेष रुपे सुनयना के प्रति सुभद्र केर व्यवहार जेना रहस्यमय होनि। ओ एहि रहस्य के उघार करय के यत्न करय लगला। पढ़ाई-लिखाई छोड़ि उदास भ गेला। एकांकी रहय लगलनि।

एकदिन गामक एक आदमी सँ पिताक पता लय चुपचाप लखनऊ गेला अरुणाभ। लखनऊ में अपन पिता सुभद्र के डेरा के पता लगेलनि। करीब 12 बजे दिन में डेरा पहुँचला जाहि खन सुभद्र अपन आफिस में ड्यूटी करैत छलनि। अरुणाभ कुनो बहाने घर पहुँचलाह त एक महिला घर खोललथिन। भीतर देखैत छथि जे एक बच्चा खेला रहल छैक। बच्चा के मुह कान सुभद्र सन्हक बुझना गेलनि। ड्रॉइंग रूम में एक छवि देखलथिन त सब किछु स्पष्ट भ गेलनि। छवि में एक महिला एक बच्चा सँग सुभद्र सँग बैसल छलि। अरुणाभ के जेना आँखि झपाय लगलनि। मुदा हिम्मत करैत ओतय सँ वापस गाम आबि गेला। अपना आप पर खौंझ आ अपन माय सुनयना पर दया भाव आबय लगलनि। होनि जे पिता सुभद्र के खून क देथि! मुदा संसार की कहतनि से सोचि चुप भेल रहलनि।

गामक बाहर छोट जातिक बस्ती रहैक। ओतय जाय पसिखाना में ताड़ी पीबथि। ओहने लोक सब सँ दोस्ती भ गेलनि। राति में देर सँ आबथि त माय सुनयना कहथिन: "ऐना कथिलेल पिबैत छी? ने विवाह ने कुनो काज धंधा। बाबा सेहो आब बूढ़ भेल जा रहल छथि। पिता अहाँक एतेक व्यस्त छथि जे हुनका लग समय के अभाव छनि। 3 बरख सँ ऊपर भ गेलनि एला।" सुनयना जेना-जेना बात कहैत गेली तेना-तेना नोरक धार बहैत गेलनि। अरुणाभ बिना कुनो जबाब देने सब बात सुनथि। जखन कहैत-कहैत सुनयना थाकि जाथि त अपना भाग के दोख दैत कनैत-कनैत ओतय सँ अपना घर दिस बिदा भ जाथि। हे नोरक धार कतेक प्रशंशा करी तोहर! जौं तूं नहि रहित' त कहिये सुनयना के करेज फाटि गेल रहितनि।

एमहर दिनभरि त जेना तेना मुदा राति मे खूब पीब लैत छलनि अरुणाभ। पीब लेथि आ घर आबि सूति रहथि।उद्देश्य मात्र ई जे माय सुनयना कुनो प्रश्न एहेन अवस्था मे नहि करती। करबौ करती त उत्तर देबाक अवस्था मे नहि रहता। कनि काज बजती आ अंततः जखन जवाब नहि भेटतनि त थाकि क सूति रहती।

अरुणाभ अपन माय सुनयना सँ पिता सुभद्र के बात नहि करय चाहैत छलनि। हुनकर सोचब छलनि जे अगर सुनयना के सत्य के पता लागि जेतनि त सुनयना एहि वेदना के वर्दाश्त नहि क पेती आ हुनकर दुख देखि अरुणाभ अपन पिता सुभद्र के खून क देता।

एहि बीच एक घटना घटित भेल। जाहि पसिखाना में अरुणाभ ताड़ी पीबाक हेतु प्रतिदिन जाइत छलनि तकर एक बहिन रहैक धनिया। धनिया के गहुमी रंग, भरल देह, उंन्नत वक्ष, आ नमहर काया रहैक। सुन्नरि गजब के छलि धनिया।

धनिया के मुदा एक दुख -विवाह के 2 बरख के भीतर ओकर घरबला खत्म भ गेलैक। ताहिदीन सँ धनिया अपन नैहर आबि गेल आ एतहि रहैत छलि।
धनिया के गस्सल रूप आ निश्चजल हंसी देखि अरुणाभ जेना ओकरा प्रेम में बताह भ गेला। एक राति धनिया के कहलथिन: "गै धनिया, तूं ओ छैं जकर तलाश हम क रहल छी। तोहर रूप सुन्नरि छौक आ तोहर हँसि निश्छल!"

धनिया लजा क भागि गेल। मुदा जाहि अंदाज़ में भागल धनिया तांहि सँ ई स्पष्ट भ गेलैक जे ओकरा अलब्धक लाभ भेट गेलैक। धनिया के अपना आप पर भरोसा नहि होइक। करे त की? ओमहर अरुणाभ बेचैन। होनि, "धनिया हमर जीवन मे आनंद आनि सकैत अछि! मुदा एकरा हमरा प्रति विश्वास कोना हेतैक?"

खैर! पहिल दिन त मन मे धनिया के टीस नेने सबदीनका डोज़ सँ कनि अधिक ताड़ी पिलनि अरुणाभ। घर गेलाक बाद जखन सुतला त भरि राति जेना धनिया के अपूर्व सौन्दर्य के सपना में विभोर भेल रहला। राति कोना बीत गेलनि से पते ने चललनि।

दोसर दिन जखन अरुणाभ के असगर में धनिया भेटलनि त झट दनि ओकर हाथ पकड़ि लेलनि। धनिया के हाथ रोड़गर मुदा सोहनगर छलैक। फिसलैत। धनिया हाथ छोड़ा भगबाक यत्न केलक मुदा व्यर्थ। किछु ना नुकुर केलाक बाद धनिया अपना आपके अरुणाभक आगा समर्पण क देलक। फेर दुनू में दैहिक आ आत्मिक प्रेमक जबरदस्त मिलान भ गेल। के की पेलक आ के की लुटेलक तकर हिसाब जोखा केनाई असम्भव। भाव आ मन, प्रेम आ तन जेना एक भ गेल हो - तिरपित-तिरपित।

फेर की छ्ल दोसरे दिन धनिया लेल अरुणाभ 3 साड़ी ओकरा सङ्गे ओहने मिलान जे ब्लाउज, पेटिकोट, आ किछु भीतर के वस्त्र सेहो आनि देलथिन। जीवन मे जाहि धनिया के कखनो नव आ दढ़ वस्त्र नहि भेटलैक से अतेक नव वस्त्र देखि अपना भाग्य पर नितराईएत छलि। "जो गए धनिया जीवन धन्य भ गेलौं।"

आब प्रतिदिन उत्तम दिन, मधुमय दिन, अभिसारक दिन भ गेलै धनिया आ अरुणाभ लेल। सब मर्यादा, सोइतपना जेना नस्तनाबूत भेल जा रहल हो। जेना एकाएक सर्वहारा वर्ग पूरा समाज के अपना अधीन क लेने हो। जेना समाजवाद अपन परचम लहरा रहल हो। जेना जाति, वर्ग आदि तरहक बुढ़ियाक फूसि सामाजिक व्यवस्थाक श्राद्धकर्म भ रहल होइक। जेना नील नभ सँ दुनू प्रेमी के शुभकामनाक फूल बरसैत हो, जेना बैकुण्ठ सँ प्रेमक देवता मंद-मंद हँसैत दुनू के प्रेम शास्वत होइक तांहि बातक आशीर्वाद दैत हो। जेना धनिया ब्राह्मण कुलक सुन्नरि हो - लहठी, गहना, वस्त्र, काजर, सिंनुर, अलता सँ सजल देह, गम गम करैत तन। बाह रे मनुख एकरे कहैत छैक सौन्दर्य। अपरूप सौन्दर्य। आ ओहि सौन्दर्य के रसपान करय बला कन्त सुपुरुष छथि विद्यापति के सुन्नरि के कन्त जकाँ अमरुख कन्त नहि।

एक दिन साँझ में प्रेमक आनंद में मातलि धनिया बाजि उठलि: "सब किछु त बड़ बढियाँ। लेकिन समाज हमर आ अहाँक संबंध के स्वीकार करत? की पता, विरोध शुरू भ जाय? की पता, हमर भाय पिताक जिनाई दूभर भ जाय? की पता, हमरे अंत क देल जाय? एहि समाजक कुन ठेकान?" धनिया सहजे रूप में अपन बात एक सांस में बाजि गेल। लेकिन ओकर सहजता में कहल बात सहज नहि छलैक बल्कि सामाजिक स्थापित संरचना पर प्रश्नचिन्ह छलैक।

आवेश में अबैत अरुणाभ धनिया के हाथ खूब जोड़ सँ पकरैत ओकर घर सँ बाहर भेला। धनिया नहि बुझि पैल जे आखिर अरुणाभ क की रहल छथि? कत' जा रहल छथि? धनिया मने मन सोचलक जे चुपचाप देखी जे ई पुरुख की चालि चलि रहल अछि?

अरुणाभ धनिया के पकड़ने एक ऑटो रिक्शा में बैसलनि आ रिकशा बला के डोकहर भगबती लग चलबाक आदेश देलथिन। रिकशा बला सेहो बुझि गेल जे आई अरुणाभ किछु अधिक तामस में छथि। बिना कुनो तर्क-वितर्क केने विदा भ गेल। डोकहर पहुँच अरुणाभ सिंनुर, फूलक माला आदि किन मंदिर गेलनि आ पंडा के आदेश दैत कहलथिन: "पंडा जी, अपने हमर सभिक एखन विवाह करबाऊ। अहाँके उचित दक्षिना आदि भेट जायेत। बेचारा पंडित सेहो पैसाक लोभे विवाहक मंत्र पढ़य लागल।  विवाहक एक घंटा के पश्चात दुनू प्राणी पति-पत्नी भ गेलनि।

धनिया के सीथ में एकबेर फेरो एक मुट्ठी सिंनुर छीटइत धनिया के हाथ पकड़ने अरुणाभ मंदिर प्रांगण सँ बाहर भेलनि आ एक दुकान में एकै थारी में चुरा-दही रसगुल्ला खेलनि। धनिया कनि लजाएल त अरुणाभ अपने हाथे धनिया में खुआबय लगलनि। आब धनिया सेहो निधोख भ गेल। दुनू एक दोसरके खुएलक। आ ओही ऑटो सँ घर आबि गेल।
 विवाहक नाटक त क लेलनि अरुणाभ मुदा ई हिम्मत नहि भेलनि जे अपन पितहमह आ माय लग धनिया के चर्चा करता। अगर यैह बात छ्ल त की ई ढोंग नहि छ्ल?
ओना इहो बात तदर्थ छैक जे अहि तरहक बात बहुत दिन धरि छुपाएल नहि रहि सकैत अछि। काने-कान बात सुनयना के पता चललनि। सुनयना के आँखि के आगा जेना अन्हार भ जानि। धड़ाम दनि माझ आँगन में खसली। लोक दौड़ल। बेहोश भेल सुनयना के पानि केर छिट्टा दय होश में अनल गेल। होश में अबिताहि सुनयना चिकरैत बजली: "देखु अरुणाभ! ई बात हमरा जिबैत सम्भव नहि अछि। अहाँक पिता दूर देस में कत छथि से नहि ज्ञात अछि हमरा। अहीं मात्र हमर आधार छी। कहिया सँ विवाह हेतु कहि रहल छी मुदा अहाँ कान बात नहि देलौं। आब एहेन कुकृत्य। ई कोना संभव।" जड़वत भेल अरुणाभ अपन माय केर बात मुड़ी गोतने सुनैत रहलनि। मात्र 3 शब्द बाजि माय के आश्वस्त केलनि: "अहाँ जेना कही।" 

घर त नहि अनलनि धनिया के मुदा ओकर साहचर्य प्राप्त करैत रहलनि अरुणाभ - दैहिक आ मानशिक। 
समय बितैत गेलैक। अरुणाभ मानशिक रुपे विक्षिप्त भ गेला। माम एलथिन आ राँची के पागलखाना में 2 मास लेल भर्ती भ गेला।

 उन्माद आश्रम में हमेशा धनिया के स्मरण में मग्न रहैत छलनि अरुणाभ। 2 मास पर माम एलथिन आ उन्माद आश्रम सँ गाम लेने एलथिन। गाम पर एलाक बाद एक बेर पुनः धनिया के प्रेम में रमि गेला अरुणाभ -अहर्निश। धनिया सेहो समाजक चिन्ता छोड़ि अरुणाभ केर प्रेम में मग्न भेल रहलि। सब किछु अद्भुत। सब रंग प्रेमरंग। रंग-रभसि सँ दुनू एक भेल, गंथल - लटपटिया सुग्गा जकाँ। ई ने भेल प्रेम! जिनका किनको प्रेम के जिबैत परिभाषा देखबाक हो ओ अरुणाभ आ धनिया के लटपटिया प्रेम सँ सिख ल सकैत छला।

एक दिन धनिया अरुणाभ के कहल्कनि : "बुझलौं?"
अरुणाभ: "की? नहि बुझलौं।"
धनिया: "जुलुम भ गेल। हम त गर्भ सँ छी! आब की हैत?"
अरुणाभ धनिया के कोरा में उठबैत बजलनि: "आब की हैत! हम आ अहाँ पति पत्नी बनि ओहि बच्चा के सामाजिक सरोकार देबैक। अगर अयाची मिश्रक पुत्र महापण्डित शंकर मिश्र निम्न जाति के महिला सँ प्रेम क सकैत छथि आ अपन पिता सँ ओहि प्रेमक सम्बन्ध में वाद-विवाद क' सकैत छथि त हम कथिलेल अहाँक प्रेमक बात नुकाबी? स्वीकार केने धर्म।"

अरुणाभक बात सुनि जेना धनिया के प्राण में प्राण एलैक। अपन माथ के अरुणाभक छाती में सटबैत प्रेमक रस में डूबल आ टभकल गरम नोर सँ अरुणाभ के पिघला देलकनि। अरुणाभ स्वप्न में चलि गेला। ओहेन स्वप्न जाहि में ओ छला, धनिया छलि आ हुनकर दूनू के प्रेमक फल।

 कहलथिन अरुणाभ: "कथिलेल चिंता करैत छी, हम अपन माय के मना लेब। दादाजी सेहो मानि जेता। नहि मानता त राखथु सब सम्पति के। नहि चाही हमरा किछुओ। हम अहाँक सँग सब सम्पति छोड़ि कतौ चलि जैब। मेहनत मजदूरी करब। अपन छोट दुनिया बसाएब।

आब धनिया निश्चिन्त भ गेल। एकेटा डर अरुणाभ के दादा के छलैक। ओ किछु तिकड़म कर' में माहिर छथि। किछु क सकैत छथि। यद्यपि धनिया चुपे रहलि। भेलैक ई बात कहि अनेरे अरुणाभ के चिन्ता में देनाई उचित नही।

धनिया गर्भ सँ अछि अहि बातक जानकारी पता नहि कोना अरुणाभ के पितामह के लागि गेलनि। बहुत चिंतित भेला। एकर प्रतिकार ताकय लगलनि।

 पाँच दिनक बाद धनिया बीमार भ गेलि। इलाज के खर्च अरुणाभ देलथिन। किछु ठीक भेलाक बाद धनिया वापस घर आबि गेलि। सब किछु ठीक रहलैक।

एक दिन भोरे कियोक अरुणाभ के सूचना देलकनि जे धनिया आत्महत्या क लेलक। मन मनबा लेल तैय्यार नहि भेलनि अरुणाभ के। भेलनि लोक असत्य बाजि रहल अछि। झट दनि एक पुड़िया सिनुर, दुनू हाथ लेल 2 दर्जन लहठी, पियरका नुआ आदि लय गेलनि देखबा लेल धनिया के। मुदा धनिया त अहि दुनिया के छोड़ि ओहि दुनिया लेल प्रस्थान क गेल रहय। जतय सँ वापस अननाई असम्भव।

अरुणाभ सोझे घर एला। अपन माय आ पितामह के कहलथिन: "भेल ने जे चाहैत रही। क देलौं ने हमर जीवन ठूठ! आब जिबू अपन सोइत परम्परा के।" ई कहैत पहिल बेर अरुणाभ के आँखि सँ दहो-बहो नोरक झड़ी लागि गेलनि। मुदा के देखत एहि व्यथा के? ज्ञानक मर्यादा आ कर्मकाण्ड केर ठीकेदार सोइत के एहि तुच्छ भावनात्मक दग्धल बहैत नोरक झोर के? ज्ञान आ अहँकार किछु क्षण लेल भावना के चकनाचूर क देलक।

ओही दिन सँ सुनयना ओछाइन ध लेली। कतेकबो इलाज भेलैक मुदा ठीक नहि भेली। कुनो चिकित्सक के कुनो दबाई काज नहि केलकनि। एक हिसाबे ई नीक भेलैक। अरुणाभ के धनिया के दर्द के सहबाक समय भेट गेलनि। माय केर इलाज आ सेवा में अतेक मगन भ गेला जेना सब किछु किछु क्षण लेल बिसरा गेलनि।

जखन कखनो सुनयना होश में आबथि त सुभद्र के स्मरण करथि। मुदा सुभद्र त अपन दुनिया के बसा लेने छला। ओहि नव दुनिया मे सुनयना आ अरुणाभक कुनो लेशे नहि। सुनयना के सत्य बात कहि अरुणाभ अंतिम अवस्था मे सुभद्र के प्रति हुनका मन मे बिदेसिया पति के बारे में गलत बात नहि भर' चाहैत छलथिन। मन मसोसि चुपे रहला। सुनयना 40 दिनक घोर वेदना सहैत अंतिम सांस लैत एहि नश्वर काया के त्यागि देलनि। मरैत काल एना बुझना जा रहल छलनि जेना हुनकर ठोड़ "प्रिय-प्रिय करते अधर ताल मेरी पूजा का चन्दन रे/ क्या पूजा क्या अर्चन रे//" कहैत होनि?

अरुणाभक नवकी सोइत कनिया के नाम छलनि अरुंधति। जखन अरुणाभ अरुंधति के मुह देखलनि त देखिते रहि गेला। ठोड़ हिलबैत नहु-नहु बजैत रहलनि: "जे भेल से भेल। आब हम कुनो परिस्थिति में अहाँक स्थिति नहि त अपन माता सुनयना जकाँ होब देब आ नहिये अपन प्रेमिका (सह पत्नी) धनिया सनक।

अहि सब बात सँ अनजान भेल अरुंधति चिड़ै जकाँ चहकैत रहलनि। शायद हुनका ई नहि बुझल छलनि जे पुरुख कखन अपन रूप बदलि लेत????

लेखक, डॉ. कैलाश कुमार मिश्र जी



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